Tuesday, 12 September 2017

गरबा प्रशिक्षण बना व्यवसाय

मां दुर्गा की आराधना का पर्व नवरात्रि
में भक्ति के लिये लोगों ने गरबा को माध्यम बनाया और कुछ वर्षो तक गरबा सिखाने
के नाम प्रशिक्षणार्थियों से मोटी फीस तो ही ली जाती है इसके अलावा आयोजन के
नाम पर शहर के प्रतिष्ठित प्रतिष्ठानों नेताओं व गणमान्य नागरिकों से तरह-तरह की
मदद ली जाती है जबकि गरबे में उतना खर्च नहीं हो पाता। साल भर अपना पेट पालने
के लिये कुछ लोगों ने गरबे को व्यवसय बनाकर रख दिया है।गरबे के नाम पर चंदा
वसूलीइन दिनों देखा जा रहा है कि गरबा आयोजन के नाम पर शहर में चंदा वसूली
भी शुरू हो चुकी है। आयोजकों के द्वारा बकायदा घरो-घरो व प्रतिष्ठानों में उनका
प्रचार करने व पास मुहैया कराने के एवज में चंदा उगाही की जा रही है। गरबा पवित्र
भावना के साथ खेला जाता रहा है लेकिन आज इस गरबाकी झलक भी नहीं दिखती
योंकि गरबा की रासलीला का स्वरूप ही परिवर्तित हो गया है जिसका जो समझ में
आता है गरबा प्रशिक्षण के नाम पर अपनी दुकान खोल लेते हैं और युवा बालिकाओं
व बालकों को गुमराह करते हैं।इस वर्ष गरबा प्रशिक्षण के नाम पर नगर की कुछ
प्रशिक्षण प्राप्त करने वालो ने नगर के संभ्रात लोगों से आयोजन के नाम पर अच्छा
खासा चंदा बटोरा और इस चंदे में प्रशिक्षण देने वालों ने एक कमेटी बनाकर राशि
वसूल कर राशि का बंदरबांट तक किया।हम यहां पर बताना चाहते हैं कि 2 माह पहले
से इन संस्थाओं द्वारा गरबा का प्रशिक्षण प्रारंभ कर दिया जाता है। संभ्रात परिवार की
महिलायें गरबा सीखने के लिये घरों से निकलती है और गरबा सीखने के साथ साथ
समाज की अनेक बुराईयो को भी अपने साथ लेकर आती है जिसके कारण गरबा की
आड़ में विकृतियां फलती फूलती हैं लेकिन इस ओर ना तो कोई बोलने का साहस
करता है और ना ही जिला प्रशासन ही इन पर अंकुश लगाता है।गरबा प्रशिक्षण हो या
महोत्सव इनके नाम से वसूला जाने वाला चंदा या उपयोग एवं आय व्यय का यौरा
लेने का दुस्साहस कोई नहीं करता है। या आयोजन समिति का दायित्व नहीं बनता
कि वे गरबा से प्राप्त आय व्यय प्रस्तुत कर अपने कार्यो में पारदर्शिता लाये लेकिन हमे
विश्वास है कि जिस दिन आय व्यय का यौरा पेश किया जाने लगेगा उस दिन हमारे
द्वारा जो बाते कही जा रही है उन बातों को भी समाज के लोग सही मानने लगेंगे। कहते
हैं सच उस कड़वी दवा की तरह होता है जो कड़वी होने के कारण बीमार को भी
स्वस्थ्य कर देती है। यही स्थिति गरबा महोत्सव की है। अगर समय रहते इस पर
विचार नहीं किया गया तो बाद में पछताना पड़ेगा।लगभग सात-आठ दिनों से अनेक
स्थानों में चल रहे गरबा महोत्सव को पारिवारिक महोत्सव का नाम दिया जाता है
लेकिन आयोजक दोपहिया चौपहिया वाहनों में आने वाले परिवार के लोगों से पार्किंग
चार्ज, प्रवेश शुल्क तथा रसीद काटने में भी पीछे नहीं रहते।इनकी यह स्थिति को
देखकर ऐसा लगने लगा है कि मानो गरबा के नाम पर इन गरबा प्रशिक्षकों को लूटने
की खुली छूट दे दी गयी है। समय की मांग है कि समाज अब गरबा प्रशिक्षकों से आय
व्यय का हिसाब मांगे । हमारा गरबा के भक्ति स्परूप में आ रही बुराईयों की ओर ध्यान
आकर्षित करने के पीछे यही उद्देश्य है कि मां भवानी की तपस्या का यह पर्व गरिमा
और शालीनता के साथ मनाया जाये ना कि लोग इसे अपनी उदर पूर्ति का साधर
बनाये। गरबा महोत्सव की परंपरा हमारे नगर में जोर शोर से बढ़ी है और चाहे गरबा
करने वाले हो या गरबा देखने वाले युवा सभी इसकी आड़ में गलत कामों को अंजाम
देते है भले ही सिवनी में ऐसे मामले प्रकाश में ना आये हो लेकिन कई महानगरों के
मामले हमें सचेत करते हैं कि हमें हमें भी संभलकर चलना चाहिए नहीं तो गरबा का
स्वरूप हमें पतन की ओर ले जायेगा और हम अपनी आने वाली पीढ़ी को जवाब
नहीं दे पायेंगे।वैसे भी देर रात्रि तक होने वाले आयोजनों को लेकर प्रशासन को
नवरात्रि में भी अलर्ट रहने की आवश्यकता है जिससे भक्ति का वातावरण से पूरा
जिला गूंजायमान हो।
गरबा प्रशिक्षण

Saturday, 24 June 2017

काश कोई नर्मदा तट के गरीब किसानों की भी सुध ले लेता

पावर प्लांट के लिये दे दी जमीनें नौकरी के  नाम पर छले गये गरीब आदिवासी 


 अमर नौरिया/राष्ट्रचंडिका/नरसिंहपुर - प्रदेश में किसान आंदोलन के बाद हरकत में आई सरकार और प्रशासनिक अमला किसानों की जहां पर भी जैसी भी समस्या है  उसके निराकरण को लेकर मुस्तैद दिखाई दे रहा है और इसके बाद जिस तरह से प्रदेश के अनेक जिलों से किसानों के द्वारा आत्महत्यायें की खबरें आ रहीं है इससे किसानों में अंदर ही अंदर सरकार की नीतियों के खिलाफ एकजुट भी होने लगें हैं नरसिंहपुर जिला मुख्यालय से लगे 17 गांवों के केंद्र बिंदु नयाखेड़ा  गांव का देवमुरलीधर मंदिर प्रांगण भी इस किसान एकता क ा गवाह बना है और आगामी 23 मई को हजारों की तादाद में जिला मुख्यालय के जनपद मैदान में किसान एकत्रित होकर धरना प्रदर्शन कर राज्यपाल के नाम ज्ञापन सौंपेगेंं । 
इस सब के बीच  जिले की गोटेगांव तहसील के अंतगर्त आने वाले सिलारी, दलपतपुर, झांसीघाट सहित अन्य आसपास के गांवों के अनुसूचित जाति जनजाति के वे किसान भी अपनी मांगों और समस्याओं को लेकर इस किसान आंदोलन के बीच राहत मिल सके इसकी आस लगाये बैठें हैं । गोरतलब है कि इन गरीब भूमिहीन किसानों  के लिये प्रदान की गई शासकीय भूमि जिसका पटटा शासन द्वारा उन गरीबों को प्रदान किया गया था उस भूमि को पावर प्लांट लगाये जाने के नाम औने पौने दाम से नौकरी दिलाने का लालच  खरीद लिया गया था किंतु पिछले 7-8 साल बीत जाने के बाद न तो उक्त भूमि पर पावर प्लांट लग पाया और न ही उन गरीबों को नौकरी मिली । 
पावर प्लांट लगाये जाने की कवायदों के बीच लुुटे पिटे दर्जनों गरीब ग्रामीणों कइ्र्र बार ज्ञापन आदि सौंप कर अपने हक की मांग उठा चुकें हैं और सरकार व प्रशासन को बता चुके हैं कि  शासन द्वारा उन्हें प्रदान की गई पटटे की भूमि से वे लोग अपने परिवार का जीवन यापन कर रहे थे किंतु पावर प्लांट लगाये जाने की बातों में हमें उन्नत जीवन भय व दलालों का आश्रय लेते हुये उनकी जमीनों को खरीदा गया तथा हमारे जैसे लगभग 326 लोगों में से केवल 31 लोगों को कंपनी में नौकरी दी गई और वाकी लोगों के भविष्य के साथ खिलवाड़ किया गया जिससे उन गरीबों के साथ रोजी रोटी का संकट खड़ा हो गया उनकी जमीनें भी चली गई और नौकरी भी नहीं मिली नतीजा यह हुआ कि वे आज मजदूरी के लिये दर दर भटक रहें हैं ।
इस संबेंध में जो जानकारी सामने आयी है उसके अनुसार मध्यप्रदेश शासन ेके राजस्व विभाग मंत्रालय वल्लभ भवन,भोपाल के पत्र कं्रमाक एफ 12-4/04/सात/2-ए , भोपाल दिनांक 1/7/2008 के अुनसार  वर्ष 2008 में निजी कंपनी टुडे होम्स एंड इन्फ्रास्टक्रचर प्रा लि द्वारा 2 गुणा 500 मेगावाट थर्मल पावर स्टेशन की स्थापना हेतु जिला नरसिंहपुर की तहसील गोटेगांव के ग्राम सिलारी की 234.050 हेक्टेयर,ग्राम खमरिया की 30.394 हेक्टेयर,ग्राम झांसीघाट की 68.040 हेक्टेयर,ग्राम बूढ़ी मवई की 0.446 हेक्टेयर एवं ग्राम दलपतपुर की 17.096 हेक्टेयर इस तरह कुल 350.581 हेक्टेयर निजी भूमि अर्जित किये जाने का प्र्रस्ताव कलेक्टर नरसिंहपुर ने आयुक्त जबलपुर के माध्यम से प्रेषित किया जिस पर भूे अर्जन समिति ने विचारोपरान्त भू अर्जन किये जाने की सहमति दी गई थी जिसमें इस बात का उल्लेख स्पष्ट तौर पर किया गया था कि कंपनी जिनि कृषकों की भूमि अधिग्रहीत की जा रही है उन कृषकों के परिवार के कम से कम एक सदस्य को कंपनी में आदर्श पुनर्वास नीति में दिये गये निर्देेशों की अनुरूप नौकरी देगी । 
इस पूरे प्रकरण में महत्वपूर्ण बात यह रही थी  कि शासकीय पटटै की कूषि भूमि के इस तरह से विक्रय किये जाने को लेकर मध्यप्रदेश विधानसभा में वर्ष 2011 में यह मामला उठाया गया था । इतना सब कुछ होने के बाद स्थिति यह है कि कं पनी के द्वारा अभी तक उक्त भूमि पर पावर प्लांट न लगाये जाने से इन सैकड़ो लोगों के साथ आज भी जो मजाक किया जा रहा है उसकी सुनवाई कहीं भी नहीं हो रही है और वे अपनी कूषि भूमि बेचकर अपने आप को ठगा हुआ सा महसूस कर रहें हैं एक ओर सरकार की लाख कोशिशें की वह किसानों के हित में फैसले ले रही है उसके बाद भी लगातार किसानों की आत्महत्यायें सरकार के दाबे पर सवाल उठा रहीं है तो ऐसे में नरसिंहपुर के धमना गांव में एक किसान ने भी अपनी जीवन लीला अपने  हाथों से समाप्त कर ली ऐसे में सैकड़ों की संख्या में अपना सब कुछ लुटा चुका झांसीघाट,सिलारी,दलपतपुर ओर खमरिया गांव के गरीब किसानों पर सरकार व प्रशासन की नजरें कब तक पड़ेगी यह देखने वाली बात है । 

ट्यूशनखोर दिखा रहे प्रेस की धौंस


क्या शालाओं मूें अध्यापन कार्य ठीक से नहीं होता?

क्या अध्यापक छात्र- छात्राओं को मार्गदर्शन नहीं देते?

क्या अभिभावको की मजबूरी है ट्यूशन अथवा कोचिंग करवाना

ऐसे तमाम सवाल समाज के लिए चुनौति बने हुए हैं। सिवनी नगर मुख्यालय में कक्षा आठवी के बाद से बच्चो को कोचिंग सेंटरो की शरण लेनी पड़ती है।
कोचिंग सेंटरो के संचालकों द्वारा कहा जाता है कि कोचिंग आने वाले बच्चों का कैरियर सवर जायेगा और वे उच्च पदो की नौकरी आसानी से प्राप्त कर सकते हैं लेकिन देखा गया कि कोचिंग जाने वालो में अधिकांश विद्यार्थियों को उद्देश्य पढ़ाई करना नहीं बल्कि भोली भाली बालिकाओं को गुमराह करना होता है और बाद में क्या कहानी होती है यह बताने की जरूरत नहीं है। 

राष्ट्रचंडिका/सिवनी। सुबह से शाम तक एसपी निवास के पास संचालित इन कोचिंग सेंटर मेें जाने वालो की संख्या हजारों में हुआ करती है बीते वषो के परिणाम बताते हैं। कोचिंग सेंटर के विद्यार्थियों में अधिकांश विद्यार्थी उत्तीर्ण तो हुए मगर उन्हें अपने लक्ष्य की प्राप्ति नहीं हुई। समाचार पत्रों में उन विद्यार्थियों की फोटो छपवाता जिन्होंने जिला एवं प्रदेश में टॉप किया है और इसका श्रेय कोचिंग सेंटरो को दिलवाना कहा तक न्यायसंगत है।
इतना ही नहीं अब तो कोचिंग सेंटर के संचालक बुराईयो को छुपाने के लिए अपने वाहनों में प्रेस लिखने लगे हैं और प्रेस की गरिमा पर कालिख लगाने का प्रयास में लगे हैं इतना ही नहीं इन्होंने अपने लूटपाट की दुकान को छुपाने के लिए अपने निवास में प्रेस कार्यालय भी पार्टनरशिप में दे रखा है। क्या इनके द्वारा किया जा रहा कृत्य न्यायसंगत है। प्रदेश सरकार शिक्षा में आ रही विसंगतियों को दूर करने के लिए नित नये प्रयोग कर रही है लेकिन ट्यूशन के कारण सारे प्रयोग असफल हो रहे हैं। पूर्व वर्षो में जिला शिक्षा अधिकारी श्रीमती निर्मला पटले ने कार्यवाही भी की थी लेकिन परिणाम सिफर निकले। 
ट्यूशन जाने के नाम पर चौक चौराहो पर आवारा लड़के लड़कियो का जमघट को बेतुकी बाते होना आदि अब आम बात हो गयी है और दिनो दिन इन विद्यार्थियों के ऊपर से नियंत्रण समाप्त हो रहा है अत: प्रेस की धौंस दिखाकर ट्यूशन का धंधा करने वालो पर कार्यवाही की मांग की गई है। 
नहीं हैं सुविधाएं
शहर में जितने भी कोचिंग सेंटर चल रहे हैं वह छात्र.छात्राओं से मनमाफिक मोटी फीस तो बसूली जाती है पर सुविधाओं के नाम पर कुछ भी नहीं देते। एक बड़े हाल में 70 से 80 छात्र/छात्राओं को जमीन में बैठकर पढ़ाया जाता है। जहां पर छात्राओं को घंटों बैठे रहने के बाद भी न तो कूलर पंखों की व्यवस्था होती है और न ही शुद्ध पेयजल की और न ही पार्किंग की। दूसरी ओर भीड़ की आड़ में कुछ शरारती तत्व छात्राओं के साथ अश्लील हरकतें भी करते हैं। उल्लेखनीय है कि ऐसी कोचिंग संस्थानों के समाचार हमारे द्वारा विगतांको में भी प्रकाशित किये जा चुके हैं लेकिन अब तक प्रशासन के कानो में जूं तक नहीं रेंगी वहीं शिक्षा विभाग में आंखे मूंदे यह सब खेल देख रहा है। नए जिला कलेक्टर से लोगों ने इस ओर ध्यान देने की जनापेक्षा जताई है। 

Saturday, 17 June 2017

कबाड़ के कारोबार के नेटवर्क को खंगाले पुलिस तो खुलेगें कई राज

कबाड़ के कारोबार के नेटवर्क को खंगाले पुलिस तो खुलेगें कई राज


राष्ट्रचंडिका/नरसिंहपुर /अमर नौरिया/जिले में बिजली के तारों की चोरी के मामले में कवाडिय़ों के द्वारा जिस बैखौफ तरीके से कार्यों को अंजाम दिया जा रहा है इससे ऐसा लगता है कि कबाडिय़ों को मानों चोरी करते समय पुलिस का भय ही न हो । कुछ समय पूर्व गोटेगांव थाने के अंतगर्त एक मामला सामने आया था जिसमें की बिजली के तारों को एक ट्रक में भरकर जिस बैखौफ तरीके से ले जाते हुये कुछ लोग पकड़ाये थे इस मामले में सूत्रों से  मिली जानकारी के अनुसार जबलपुर के कुछ चिंन्हित कबाडिय़ों के नाम सामने आने के बाद पुलिस अधिकारियों ने अपनी ओर से संबंधों की बुनियाद पर मामले को अपने तरीके से जांच की थी नतीजा यह हुआ था कि इस मामले में बड़ा पर्दाफाश हो जाता किंतु पुलिसिया कार्यवाही के चलते वह अपने पूर्ण अंजाम तक नहीं पहुंचा ।
मिली जानकारी के अनुसार गाडरवारा थाने के अंतगर्त ग्राम कौडिय़ा के पास से इसी तरह से बिजली के तारों को भरकर ले जाते हुये एक ट्रक को गाडरवारा पुलिस की मुस्तैदी से पकड़ लिया गया और जो जानकारी सामने आयी है उसके अनुसार नरसिंहपुर के किंन्हीं दो लोगों ने बाहर से माल लेकर आये एक ट्रक से माल परिवहन का सौदा कर कौडिय़ा से बिजली का तार भरकर ले जाने की बात की थी जिसके चलते पुलिसिया कार्यवाही के दौरान ट्रक के चालक और परिचालक धरपकड़े गये ।
नरसिंहपुर में जिस तरीके से कबाड़ की आड़ में चोरी को अंजाम दिया जा रहा है इससे लगता है कि इस पूरे रैकेट क े तार किसी बड़ी गिरोह से जुड़े हुये हैं जिसको यह  पूरी जानकारी रहती है कि उसे किस तरह से कहां से कबाड़ की आड़ में कितना माल उठाना है और जिस तरीके से दिन दहाड़े इस तरह से कामों को अंजाम दिया जाता है तो लगता है कि इनके पीछे जिनका संरक्षण है वे भी काफी पहुंंंचे लोग हैं जिसकी बजह से कबाड़ चोरी के जितने भी मामले आये हैं उनमें पुलिस इनके सरगनाओं तक नहीं पहुंच पायी है।
सूत्रों के अनुसार जिले में कबाड़ का कारोबार संचालित करने वाले कुछ लोगों ने कम समय में ही करोड़ों की संपत्ति जमा कर ली है पुलिस और अन्य जांच एजेंसियां अगर कबाड़ के कारोबारियों के द्वारा अल्प समय में कमाई गई संपत्ति का रिकार्ड तो खंगालेंगी तो कबाडिय़ों के पूरे नेटवर्क के राज भी खुल सकेंगें । वहीं कुछ कबाडिय़ों की संपत्ति को लेकर तो कुछ शिकायतें भी की गई हैं फिलहाल देखना यह है कि आखिर गाडरवारा पुलिस के द्वारा जो मामले में धरपकड़ की गई है उसके सूत्रधारों तक पुलिस के हाथ पहुंंच पाते हैं या नहीं । 


राष्ट्रचंडिका/मंडला/सोमेश चौरसिया/ स्थानीय हागगंज बाजार में चुन्नीलाल नन्दन कुमार जैन की दुकान से श्रीकृष्णा मिल तक बनी दुकानों तथा प्रस्तवित नई सब्जी मण्डी के बीच दुकानों के ऊपर जाने हेतु बनाई गई सीढ़ी का उपयोग विगत् कई सालों से सार्वजनिक मूत्रालय के रूप में हो रहा है। जिससे स्थानीय व्यापरियों में अत्याधिक रोष व्याप्त है देशबंधु से चर्चा के दौरान स्थानीय व्यापारियों द्वारा बताया गया की नगर पालिका परिषद मण्डला द्वारा श्री कृष्ण मिल स्टोर्स आटा चक्की के बाजू में महिला एवं पुरूष सार्वजनिक मूत्रालय बनाये गये थे जिसका उपयोग जन सामान्य द्वारा किया जाता रहा है परन्तु इसके बावजूद भी बाजार स्थित प्रश्नाधीन सीढ़ी का उपयोग सार्वजनिक मूत्रालय हेतु तत्वों द्वारा किया जाता रहा है। वर्तमान में सीढ़ी तथा उसके ऊपर के छत का प्लास्तर जीर्ण-शीणं हो गया है तथा आए दिन गिरता रहता है जिससे कभी भी कोई दुर्घटना हो सकती है। व्यापारियों के दुकानों के बीच बने इस अघोषित मूत्रालय में सफाई एवं पानी की व्यवस्था नही है और न ही मान-मर्यादा के संदर्भ में दरवाजे की व्यवस्था हेै इस प्रकार की स्थिति में पेशाब की दुर्गन्ध से व्यापारियों का जीना हराम हो गया है, इस बाजार पर अधिकंाश दुकाने महिलाओं के सैादन्र्य एवं महिला  रेडीमेंट कपड़े, महिलाओं के पर्स व बैग इत्यादि की दुकाने है वहीं प्रतिदिन बदबू का सामना करना पडता है जिससे  उनके स्वास्थ्य पर विपरीत रूप से असर पडऩा स्वाभाविक है तथा डेंगू, चिकिंनगुनिया एवं अन्य संक्रामक बीमारियों के प्रकोप से इंकार नही किया जा सकता। इस अघोषित   मूत्रालय के दूसरी ओर प्रस्तावित सब्जी मण्डी की 33 से 37 नम्बंर की दुकान तथा उसके सामने छ:-आठ सब्जी दुकाने ऐसी होगी जहां से पेशाब करते व्यक्ति को खुली आखों से देखा जा सकेगा तथा ये सब्जी विक्रेता भी पेशाब की बदबू से वहां दुकान नही लगा सकेगें। व्यापारियों द्वारा विगत् तेरह वर्षो से इस अघोषित मूत्रालय को बंद करने हेतु अनेकों बार आवेदन प्रस्तुत किये गये परन्तु बीच में ही कुछ दिनों मूत्रालय बंद किया गया तथा श्रीकृष्ण मिल स्टोर आटा चक्की के पास महिला एवं पुरूष हेतु प्रथक-प्रथक मूत्रालय स्थापित किये गये परन्तु प्रस्तावित सब्जी मण्डी के निर्माण में बनाये गये मूत्रालयों को अलग कर दिया गया तथा ढाक के तीन पात की कहाबत चरितार्थ हुई तथा विभिन्न आवेदनों के बाद भी समस्या ज्यों की त्यों रही। व्यापारियों की नगर पालिका प्रशासन से अपील है कि बाजार स्थित सीढ़ी में दीवार उठाकर अघोषित मूत्रालय को बंद किया जावें तथा प्रस्तावित सब्जी मण्डी में व्यापारियों व आम जनता के लिये महिला एवं पुरूष सार्वजनिक मूत्रालय का निर्माण प्राथमिकता के आधार पर कराया जावें। 

जनविरोधी निर्णय के जनजागरण को लेकर निकलेगी शटल संदेश यात्रा

इटारसी सतना इटारसी शटल को पूर्वत: चलाये जाने की मांग को लेकर संपन्न हुआ धरना
राष्ट्रचंडिका/नरसिंहपुर। पश्चिम मध्य रेल्वे  के अंतगर्त चलने वाली रेलगाडिय़ों का संचालन  जिस अव्यवस्थित तरीके से संचालित किया जा रहा है उसका खामियाजा क्षैत्र के आमजन को भुगतना पड़ रहा है । रेलों के संचालन के बाद रेलों में जिस तरह से सुविधाओं के नाम पर यात्रियों की जेबों से नये नये नियम बनाकर पैसे निकाले जा रहें हैं इससे लगता है कि सरकार रेलसेवा दिये जाने की आड़ में आमजनता के गाढ़े खून पसीने की कमाई को किसी न किसी बहाने अपने कब्जे में लेना चाह रही है ।
पश्चिम मध्य रेल्वे के अंतगर्त इटारसी सतना इटारसी शटल गाड़ी संख्या  51673/51674 जो कि इटारसी सतना रेलखंड के छोटे छोटे स्टेशनों तक की यात्रा करने वाले साधारण आमजन के लिये पिछले कई सालों से सुविधाजनक और किफायती थी उस का संचालन रेलमंडल ने पिछले कई माह से बंद कर  दिया है जिसके चलते इस गाड़ी से रोजमर्रा के कामकाज सहित छोटे छोटे कामधंधे करने वाले दैनिक यात्रा करने वाले यात्रियों व तीज त्यौहारों सहित शादी विवाह के सीजन में परिवार सहित आने जाने वाले लोगों को अन्य गाडिय़ों से यात्रा करना जहां एक ओर महंगा व भारी असुविधाजनक हो रहा है ।
इटारसी सतना इटारसी शटल गाड़ी लोगों के जीवन का एक हिस्सा बन गई थी और इस तरह से उसका संचालन बंद किया जाना रेल्वे विभाग का जनविरोधी निर्णय है । रेल्वे द्वारा शटल गाड़ी का संचालन बंद किये जाने को लेकर नरसिंहपुर जिले के अनेक गांवों व कस्बों के लोगों को हो रही परेशानियों को लेकर अनेक सामाजिक संगठनों सहित सामाजिक कार्यकर्ताओं व जागरूक नागरिकों द्वारा इस संबंध में एक दिवसीय सांकेतिक धरना जिला मुख्यालय नरसिंहपुर के जनपद मैदान में दिया गया ।
इस धरने में उपस्थित अनेक सामाजिक कार्यकर्ताओं ने रेल विभाग के शटल बंद किये जाने के निर्णय को लेकर शीघ्र ही इसे पूर्वत: चलाये जाने के मांग की । धरने में अपने उदबोधन के दौरान पंतजलि योग समिति की तहसील प्रभारी इुंदुसिंह ने कहा कि 1977 में स्वर्गीय हरिविष्णु कामथ जी के प्रयासों से प्रारंभ हुई शटल के बंद किये जाने की पूर्ति कोई अन्य गाड़ी के माध्यम से नहीं हो सकती और इसके पुन: चलाये जाने की मांग को लेकर धरना रूपी इस जनयज्ञ में सभी लोगों को अपनी अपनी ओर से मांग रूपी आहुति देनी होगी । शटल को बंद करके गरीबों की लाइफलाइन को काट दिया गया है ।  मां भारती मानव सेवा समिति के पदाधिकारी सुनील चौकसे ने बताया कि जनता को उम्मीद नहीं थी कि शटल की सुविधा छीन ली जायेगी और इसे विद्युतीकरण के कार्य होने के नाम पर बंद कर दिया जायेगा रेल विभाग इस तरह से अनुचित निर्णय लेकर जनता के साथ छलावा कर रहा है । जागरूक नागरिक मंच के मंजीत छाबड़ा ने कहा कि शटल बंद करना रेल्वे को निजीकरण की दिशा में लिये जा रहें निर्णयों की तरह एक कदम है जिस तरह से रेलवे के स्टैेशनों को निजी हाथों मे ंसौंपा जा रहा है उसी तरह से ट्रेनों को भी सौंपा जायेगा । क्रांतिकारी क ोटवार संघ के सरंक्षक लीलाधर मेहरा ने सरकार के इस तरह से लिये जा रहें निर्णय को लेकर लोगों को गुलामी की ओर ले जाने की दिशा में एक कदम बताया ओर जहां चुनाव पूर्व किये बादों की बात बताई उसके विपरीत सरकार द्वारा लिये जा रहें जनविरोधी निर्णयों से आमजनता को जिस तरह से परेशान किया जा रहा है यह बर्दाश्त करने वाली बात नहीं है । एडवोकेट सुलभ जैन ने शटल बंद किये जाने के विरोध में दिये जा रहे सांकेतिक धरने को अंधेरे में दिये जलाने के समान बताया और कहा कि आने वाले समय में शटल को बंद किये जाने के इस अंधेरे पूर्ण लिये गये निर्णय को जनता का एक एक व्यक्ति अपने  एक एक दीपक के प्रकाश से उजाला फैलाकर पुन: शटल को प्रारंभ किये जाने का कार्य करेगा । समाजसेवी शशिकांत मिश्र ने शटल को बंद किया जाना आमजनता के हितों की अनदेखी बताया और इस पूरे मामले में जनप्रतिनिधियों की चुप्पी को लेकर भी आने वाले समय में इस बात को लेकर उनकी जिम्मेदारी का अहसास कराये जाने की बात कही ।
समाजसेवी बाबू लाल पटैल ने अपने उदबोधन में शटल को बंद किये जाने के खिलाफ आगामी समय में नरसिंहपुर जिलें में शटल संदेश यात्रा निकालने के प्रस्ताव को लेकर बताया कि इसके माध्यम से गांव गांव जाकर लोगों को उनकी लाइफलाइन कही जाने वाली शटल गाड़ी को बंद किये जाने के सरकार के इस निर्णय के खिलाफ लगातार जनजागरण अभियान चलाया जायेगा और फिर एक वृहद आंदोलन किया जायेगा ।   धरने में मनु विश्वकर्मा समाज संगठन के उपाध्यक्ष मोहन लाल विश्वकर्मा, सहित प्रमुख रूप से उमाशंकर पटैल,राकेश चरण दुबे, निहाल सिंह पटैल,अनिल श्रीवास्तव,शैलेन्द्र विल्थरे करेली से,चंद्रप्रकाश अग्रवाल चंदपुरा ,मनोज लोधी,मनीष लोधी सुजवारा, स्कन्द शर्मा समनापुर, किशोरी लोधी हर्रई, सोबरन सिंह लोधी, सुंदरलाल यादव छीताघाट, गोविंद सिंह पटैल, गोगावली, गिरिराज यादव मड़ेसुर,श्रीमती मंजु ठाकुर सहित अनेक सामाजिक कार्यकर्ताओं प्रमुख रूप से उपस्थित रहे ।

परिषद को के.के. से अच्छा नहीं मिला प्रभारी

परिषद को के.के. से अच्छा नहीं मिला प्रभारी

स्वार्थसिद्धि के लिए दे दिया पद

जीवन के सर्वागीा विकास के लिए शिक्षा को सर्वोपरि माना गया है और ऐसा माना जाता है कि जीवन में जो अच्छी तरह शिक्षा ग्रहण करता है उसे समाजसेवा का मौका देती है लेकिन कुछ स्वार्थी तत्व अपने आप को शिक्षाविद कहते हैं और शिक्षा के नाम पर मासूमो के भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं क्या यह समाज ऐसे लोगों को माफ करेगा।

राष्ट्रचंडिका/ सिवनी। डीपी चतुर्वेदी महाविद्यालय के संचालक के.के. चतुर्वेदी का नाम किसी से छिपा नहीं है हर माह विश्वविद्यालय इन्हें किसी ना किसी अवार्ड से सम्मानित करती है ये अवार्ड ऐसे हो गये है जैसे घर में होने वाली कथा के बाद प्रसाद दिया जाता है ठीक वैसे ही यूनिवर्सिटी इन्हें अवार्ड देती है बेहतर होता बीते वर्ष की घटना पर भी लोग इन्हें एक अवार्ड या मेडल देते तो बेहतर होता।
हाल ही में भाजपा की विंग कही जाने वाली अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद जिसे अनुशासन आदर्श के नाम से जाता जाता है इस परिषद के राहुल पाण्डे एवं पियुष दुबे ने अपने थोड़े से लाभ के लिए ऊपर के मंत्रियो से कहकर केके चतुर्वेदी को तीन जिलो का प्रभारी बना दिया है इसके पीछे क्या कारण है यह जनचर्चा का विषय बना हुआ है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार राहुल पाण्डे एवं पियुष दुबे द्वारा केके चतुर्वेदी से इस शर्त पर यह दायित्व दिलवाने का मौखिक अनुबंध किया कि अगर वे अपने कॉलेज से उन्हें एमएसडब्ल्यू नि:शुल्क करवा देंगे तो वह इसके एवज में उन्हें परिषद का तीन जिलों का प्रभारी बनवा देंगे। जानकारों  का कहना है कि एमएसडब्लू जैसा महंगा कोर्स करने में 50-50 हजार रूपए की राशि खर्च करनी पड़ती है लेकिन इन दोनों ने फुकट का चंदन घिस मेरे लल्लू की कहावत को चरितार्थ किया है।
हम याद दिलाना चाहते है कि बीते वर्ष जो घटना इस डीपी चतुर्वेदी महाविद्यालय में घटी थी और जिसके सूत्रधार स्वयं के.के. चतुर्वेदी को माना गया था अभी उक्त मामले का अंतिम फैसला न्यायालय को में प्रतिक्षित है इसके बावजूद भी परिषद के वरिष्ठ पदाधिकारियों को जिले में कोई ऐसा नाम नहीं मिला जो परिषद की गरिमा को बढ़ा सकता। अगर यही स्थिति रही तो आने वाले समय में लोग अन्य संगठनों की तरह इस संगठन को भी गलत निगाह से देखेंगे।
बीते वर्ष घटित घटना के संदर्भ में राष्ट्रीय छात्र संगठन एनएसयूआई ने तो केके चतुर्वेदी का खुलकर विरोध किया था लेकिन एबीवीपी ने तो अपना मौन तक नहीं तोड़ा था इसके पीछे एक ही कारण माना जा रहा है कि चतुर्वेदी ने परिषद को अच्छा खासा सहयोग देकर उनके मुंह पर पट्टी बांध दी थी जिससे सदस्य उनके खिलाफ ना बोले जहां छोटी छोटी बातों को लेकर परिषद आये दिन सड़कों पर नारेबाजी करती है लेकिन उस घटना पर मौन रहना इस बात का सकेत है कहीं ना कहीं कुछ गड़बड है।
जो व्यक्ति घर परिवार के बीच अपनी मर्यादा को लांघ सकता है उससे समाज क्या अपेक्षा करेगा बेहतर होगा की परिषद ऐसे लोपियुष-राहुल की राजनीति का शिकार हुआ युवा छात्र
पियुष एवं राहुल की गंदी राजनीति का शिकार एक सक्रिय युवक भी हुआ जिसे जिला संयोजक का पद दिया जाने वाला था लेकिन इन दोनों ने ही उक्त सक्रिय छात्र का पत्ता कट करते हुए अपने आका का फोन कर किसी और को यह पद दिलवा दिया जबकि उक्त युवक का नाम फायनल ही माना जा रहा था लेकिन इनकी गंदी राजनीति ने छात्र को अपना शिकार बना लिया। गों को शामिल करने से पहले अच्छी तरह से विचार करें।

Thursday, 4 May 2017

क्यों मुस्कुराते हैं हेलमेट पहने मीडियाकर्मी को देखकर तथाकथित पत्रकार

क्यों मुस्कुराते हैं हेलमेट पहने मीडियाकर्मी को देखकर तथाकथित पत्रकार

राष्ट्रचंडिका/सिवनी। अगर आप सिर पर हेलमेट लगाते हैं तो उससे ापकी सुरक्षा दोपहिया वाहन में सुनिश्चि
त मानी जाती है क्योंकि शरीर का मुख्य अंश कहा जाने वाला मस्तिष्क की सुरक्षा से आप अपने आपको नया जीवन देते हैं। अक्सर देखा जाता है कि राष्ट्र का चौथा स्तंभ कहे जाने वाले मीडियाकर्मी जब अपने अन्य साथियों को हेलमेट पहने देखते हैं तो उन्हें ऐसा प्रतीत होता है जैसे हेलमेट पहनना उनके लिये अपमान है। हमने हमेशा प्रयास किया है कि शासन अगर जनहित के कार्य करता है तो हम भी उसे सहयोग प्रदान करें और स्वयं भी उनके निर्देशो का पालन करें आखिर शासन के लोग हेलमेट अभियान के माध्यम से लोगों को इसलिए प्रेरित करते हैं कि वे हेलमेट के माध्यम से दुर्घटना से स्वयं को बचाये। मीडियाकर्मियों को चाहिए कि वे दूसरो को प्रेरित करने से पहले स्वयं भी हेलमेट पहने और दूसरों को भी प्रेरित करें। अगर अपना साथी हेलमेट पहना है तो हमें चाहिए कि उसकी पीठ नहीं थपथपा सकते तो कम से कम उन्हें हेय और तिरस्कार की दृष्टि से ना देखें। 

अधिमान्य पत्रकार का नहीं कोई मापदण्ड

अधिमान्य पत्रकार का नहीं कोई मापदण्ड
राष्ट्रचंडिका/सिवनी। मीडियाकर्मियों को अधिमान्य पत्रकार का दर्जा दिया जाने को लेकर जो खेल चल रहा है वह किसी से छिपा नहीं है। लोग 30 वर्षो से कार्य करने के बाद भी अपने आपको अधिमान्य पत्रकार का दर्जा नहीं दिला पाये और कुछ स्थानों पर स्थिति है एक समाचार पत्र से ही अनेक लोग जो अधिमान्य पत्रकार के मानक मापदंडो के विरूद्ध अधिमान्य होकर शासन की योजनाओं का लाभ ले रहे हैं।
अधिमान्य पत्रकार के लिए भेजे जाने वाले नामों के चयन के लिए एक समिति गठित की जाती है जो सारे दस्तावेजों का अध्ययन के उपरांत अपनी रिपोर्ट जनसंपर्क संचालनालय भोपाल भेजती है इसके पश्चात वहां से इन नामों का चयन कर अधिमान्य पत्रकार होने की अनुमति प्रदान की जाती है लेकिन इस सारी प्रक्रिया के दौरान भाई भतीजावाद का जो खेल चल रहा है उससे वास्तव में इस योग्य पत्रकारो के साथ छल किया जा रहा है
प्रशासन से अपील
 अत: जिला पुलिस प्रशासन से अनुरोध है कि पुलिस वेरिफिकेशन के दौरान इनके द्वारा प्रस्तुत दस्तावेजों का सूक्ष्मता से जांच के उपरांत ही बिना किसी मीडियाकर्मी के खिलाफ कार्यवाही करें जिससे इस परम्परा पर अंकुश लग सके।

डी ब्लॉक वाले पत्रकारों को विभाग ने क्या नहीं हटाया
राष्ट्रचंडिका/ सिवनी। जिले में अनेक लोग है जो किसी ना किसी व्यवसाय में लगे हुए है लेकिन हाल ही में पत्रकारिता जगत के अनेक संगठन है जो अपने आपको मजबूत करने के लिये इन व्यवसायियों को अपने संगठन का कार्ड देकर अवैध एवं अनैतिक कार्य के लिये प्रोत्साहित किया जा रहा है। 
क्या पत्रकार जगत के लिये यह शर्म की बात नहीं है कि जिन हाथों में किताब या कलम है उनकी उपेक्षा कर ऐसे लोगों को हम महत्व दे रहे हैं जो कि अखबार को काला अक्षर भैंस मानते हैं। किसी भी कार्यालय में जाकर अफसरों के सामने अफसरशाही बताना और मैं ये छाप दूंगा वो छाप दूंगा जैसी धमकी देकर उन्हें अपना महत्व बताने का फैशन चल रहा है। सुरसा की तरह ये पत्रकार कहीं भी उग जाते हैं और अपने को सर्वमान्य बताने का प्रयास करते हैं। जिला जनसंपर्क विभाग को भी हम इसके लिए दोषी मानते हैं जहां पर ऐसे ऐसे समाचार पत्रों के नाम अंकित है जो कई वर्षो पहले बंद हो चुके हैं या फिर नियमित प्रकाशित नहीं होते लेकिन विभाग द्वारा आज तक इन समाचार पत्रों को अपडेट नहीं किया गया। आज भी समाचार पत्रों की सूची में डी ब्लॉक में आने वाले समाचार पत्रों के संपादक एवं अन्य लोग अपनी धौंस जमाने में पीछे नहीं रहते लेकिन इन पर समय रहते अगर लगाम नहीं लगायी गयी तो ये पूरे पत्रकारिता जगत को ही गंदा कर देंगे। आज स्थिति यह है कि विभागों में फर्जी कार्डधारी एवं फर्जी पत्रकारों के कारण सम्मानजनक पत्रकारो को ही सही जानकारी नहीं मिलती और राष्ट्रीय स्तर के पत्रकार विभागों में जाने से भी कतराने लगे हैं। आखिर पत्रकार संगठन इन पर अंकुश लगाने के स्थान पर इन्हें बढ़ावा क्यों दे रहा है। अगर जिला प्रशासन इन पर लगाम नहीं लगायेगा तो यह विकास के मार्ग में अवरोध पैदा करेंगे। 

Saturday, 29 April 2017

सडक़ के निर्माण से उड़ रही धूल से लोग परेशान गुणवत्तायुक्त हो निर्माण

सडक़ के निर्माण से उड़ रही धूल से लोग परेशान गुणवत्तायुक्त हो निर्माण 


 राष्ट्रचंडिका/नरसिंहपुर -   एन एच 26 खेदा पुल के पास से सुभाष पार्क  चौराहे से स्टेशन से होते हुये खमतरा वायपास तक  साढ़े बारह करोड रूपयों की लागत से बनाये जाने वाली लगभग साढ़े पांच किलोमीटर सीमेंट कंक्रीट सडक़ का निर्माण कार्य को प्रारंभ हुये लगभग 7-8 माह बीत चुके हैं इस दौरान यह सडक़ खेदा पुल के पास से बनते हुये खैरी नाका के पास तक पहुंची है किंतु इसके निर्माण में उपयोग किये जाने वाली पीली मिटटी की धूल से सडक़ किनारे व उसके आसपास रहने वालों को पिछले कई महीनों से भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है नतीजतन उनके स्वास्थ्य पर इसका बुरा असर पड़ रहा है तो उनकी दिनचर्या भी प्रभावित हो रही है ।
 आम नागरिकों व आम राहगीरों को हो रही परेशानियो ंको लेकर गत दिवस सामाजिक कार्यकर्ताओं ने एक ज्ञापन कार्यपालन यंत्री लोक निर्माण विभाग के नाम सौँपकर इस मार्ग पर दिन रात उडऩे वाली धूल से हो रही परेशानी को तत्काल ही निराकृत किये जाने की मांग की व इस सडक़  का निर्माण गुणवत्तायुक्त हो सके इस हेतु सडक़ निर्माण से संबंधित सूचना पटल जिसमें सडक़ के निर्माण से संबंधित पूर्ण जानकारी अंकित हो उन्हें लगाये जाने,सडक़ निर्माण हेतु अभी तक उपयोग किये गये मटेरियल की लैब रिपोर्ट उपलब्ध कराये जाने,सडक़ निर्माण मटेरियल की शासन द्वारा मान्यता प्राप्त लेैब से जांच कर इस निर्माण की डीपीआर की कापी उपलब्ध कराये जाने की  मांग की गई है  जिससे की इसकी समस्त जानकारी आमलोगों को होने पर इस सडक का निर्माण गुणवत्तापूर्ण तरीके से संपन्न हो सके। गौरतलब है कि खेदापुल के पास से सुभाष पार्क चौराहे तक बनाई जाने वाली इस सडक़ का निर्माण कार्य इतनी मंथर गाति से किया जा रहा है जिससे की एक पटरी पर कार्य चालू होने के कारण दूसरी पटरी पर बिछाई गई पीली मिटटी आते जाते वाहनों के चलते इतनी अधिक उड़ती है कि मोटर साइकिल सहित अन्य छोटे वाहनों से आने जाने वाले लोगों को भारी परेशानी हो रही है वहीं नाम मात्र का पानी सींचने के चलते इस पर पूरी तरह से नियंंत्रण नहीं हो पा रहा है जबकि प्राप्त जानकारी अनुसार सडक़ निर्माण कार्य के दौरान इस तरह से धूल उडऩे से रोकने के पुख्ता प्रबंध किये जाने के निर्देश भी निर्माण कार्य की शर्तो के अधीन हैं ज्ञापन सौंपने वालों में प्रमुख रूप से बाबूलाल पटैल,ब्रजेश घारू,विमल वानगात्री,बबलू मेहरा,अरूण शर्मा,मंजीत छाबड़ा,राजेंद्र चौरसिया आदि उपस्थित थे । 

नपा के अधिकारी भी करते हैं माल सप्लाई व ठेकेदारी


ठेकेदारी की मलाई में गोते खा रहे नपा के कर्मचारी

अधिकारियों के कृपापात्र है करोसिया

नगर पालिका सिवनी में भ्रष्टाचार अपनी चरम सीमा पर है यहां पर काम करने वाले कर्मचारियों की मानो मोनोपल्ली चल रही है। नगर को स्वच्छ बनाने के लिये लगभग डेढ़ सौ से 200 (सफाईकर्मी) दैनिक वेतन भोगी के रूप में कार्य करते हैं और ये कर्मचारी कहां काम करते हैं कोई नहीं जानता। इन लोगों का वेतन निकालने का दायित्व संतोष करोसिया का है चूंकि सभी कर्मचारी संतोष करोसिया के आपने कुछ परिजन है इसलिए इन्हें उपकृत कर बिना ड्यूटी के वेतन निकाला जाता है।

राष्ट्रचंडिका/सिवनी। अनेक कर्मचारी तो ऐसे भी है जो ड्यूटी में आते ही नहीं लेकिन उनका वेतन इसलिए निकाला जाता है कि उसमें सीएमओ और संतोष करोसिया की मिलीभगत होती है, किसी के घर कोई कार्यक्रम हो अथवा कोई पर्व के अवसर पर ड्यूटी लगाने के लिये सीएमओ और संतोष करोसिया द्वारा वार्ड जमादार को कहा जाता है, वार्ड जमादार संतोष करोसिया के इशारे पर ऐसे लोगों की ड्यूटी लगाते हैं जो उन्हें किसी प्रकार से कमीशन या लाभ प्रदान नहीं करते। नगर पालिका की स्टेशनरी खरीदना हो गया सफाई के लिये उपयोग आने वाली सामग्री सभी के बिल भी संतोष करोसिया द्वारा आसानी से पास किये जाते हैं और इन बिलों में कमीशन के रूप में मिलने वाली राशि का बंदरबांट करना आम बात हो गयी है। कलेक्टर के निकट होने का सीएमओ किशन ठाकुर द्वारा भरपूर लाभ उठाया जा रहा है चूंकि संतोष करोसिया सभी को लाभ पहुंचाते हैं इसलिए कोई उनका विरोध करने से डरते हैं जब कोई व्यक्ति उनकी शिकायत लेकर जाता है तो वे कहते हैं कि आप शिकायत दे दें उस पर कार्यवाही होगी लेकिन उस शिकायत को दबा दिया जाता है क्या ऐसे व्यक्ति को नगर पालिका के केशियर जैसे पद पर रहने का अधिकार है।
देखने एवं बातचीत करने में इतने भोले भाले दिखते हैं मानो पानी को पानी ना कहकर मम कहते हों लेकिन इनके क्रियाकलाप चांदनी रात में उस अमावश की तरह है जो चांदनी की रोशनी को भी दबा देती है। क्या नगर पालिका परिषद के पास कोई और कर्मचारी नहीं जो वास्तव में लोगों को इस पद की गरिमा के अनुकूल सुविधा दिला सके तथा भ्रष्टाचार को समाप्त कर सके।

नपा के अधिकारी भी करते हैं माल सप्लाई व ठेकेदारी

सिवनी नगरपालिका अपने आप में एक अनूठी नगरपालिका है। यहाँ इसके पूर्व तक पार्षदों के ठेकेदारी का काम करने की खबरें गाहे बगाहे आते रहती थी। अब जो खबरे आ रही है वो तो बहुत ही आश्चर्य में डालने वाली है, जानकारी अनुसार यहाँ के अधिकारी सप्लाई और कर्मचारी ठेकेदारी में मग्न है। अपने नैतिक कत्र्तव्य शासकीय सेवा को छोडक़र खुद ही माल काटने में जब ये लग जाते है तो आप समझ सकते है कि गुणवत्ता का पैमाना क्या होता होगा। यहाँ तो खुद ही काम करो, खुद ही बिल बनाओ और खुद ही मनचाहा चेक काटो ऐसी स्तिथि बानी हुई है। एक कर्मचारी विशेष रूप से इन सभी कामो में महारत रखता है और वो है *संतोष करोसिया*। पूर्व में भंडारी पद पर रहते सभी सप्लायर्स से सांठ गाँठ थी, पर जबसे प्रभारी लेखपाल हुए है तो एक सोनी ठेकेदार के माध्यम से गली गली में रोड़ और नालियों का दोयम दर्जे का निर्माण भी कर रहे है। इनकी दबंगता के आगे मुख्य नपा अधिकारी किशन सिंग ठाकुर समेत सभी इंजिनियर मौन नजर आते है। हो सकता है कि ये अधिकारी भी कुछ प्रतिशत के सांझेदार हो इन कामो में, किंतु सिवनी को गर्त में डालने और जनता के पैसे को पलीता जिस प्रकार से लगाया जा रहा है उसका कोई सानी है। भाजपा की शासन में इस प्रकार हो रही अंधेर गर्दी और स्वयं को पाक साफ बताने वाले विधायक भी आँखे मूंदे हुए है।

Sunday, 23 April 2017

पत्रकारिता को बदनाम कर रहे है तथाकथित पत्रकार

पत्रकारिता को बदनाम कर रहे है तथाकथित पत्रकार

राष्ट्रचंडिका/समाज के समाजिकरण तथा समय समय पर समाज के सन्दर्भ में सजग रहकर नागरिको तथा शासनकर्ता व बुद्धिजीवी वर्गो में दायित्व बोध करने की कला को पत्रकारिता की संज्ञा दी गयी है। समाजहित, राष्ट्रहित में सम्यक प्रकाशन को पत्रकारिता कहा जाता है असत्य अशिव असुन्दर पर सत्यम शिवम् सुन्दरम की शंख ध्वनि ही पत्रकारिता है।
मनुष्य स्वाभाव के हीन व्यक्तियेां को उत्तेजना देकर, हिंसा द्वेश फैलाकर, बडों की निंदाकर, लोगों की घरेलू बातो पर कुत्सित टीका टिप्पणी कर, अमोद प्रमोद का अभाव, अश्लीलता से पूर्ण करने की चेेष्टा कर तथा ऐसे ही अन्य उपायों से समाचार पत्रों की बिक्री और चैनलों का क्रेज तो बढाया जा सकता है। महामूर्ख धनी की प्रसशा की पुल बांध कर तथा स्वार्थ विशेष के लोगो के हित चिंतक बनकर भी रूपया कमाया जा सकता है।
देश भक्त बनकर भी स्वार्थ सिद्धि की जा सकती है। लेेकिन सब कुछ अगर पत्रकारिता के आड मे हो तो कितना शर्मनाक है। सिवनी क्षेत्र में कुकुरमुत्तों की तरह फैले तथाकथित, पत्रकार, पत्रकार शब्द के गौरव को नष्ट करने के लगे हुये है। क्षेत्र मे दर्जनों ऐसी गाडियाँ है जिनमें प्रेस अथवा पत्रकार लिखा हुआ है। वास्तविकता यह है। कि ऐसे लोग न किसी समाचार पत्र से जुडे हुये है। और न ही व पत्रकार है न उनका अकबार क्षेत्र में आता हैै। दलाली में जुटे तथाकथित पत्रकारों ने कर्मठ और निष्ठावान पत्रकारों को बदनाम करने की ठान ली है। कहीं लकडी कटान से अवैध वसूली तो कही लोगों को गुमराह कर दलाली से क्षेत्र के लोग देखकर हैरान है।
कुछ तथाकतिथ ऐसे भी पत्रकार पनप चुके है। जो कि अपने लच्छेदार बातो से हाईफाई बताकर किसी का शस्त्र लाइसेंस बनवाने, जमीन का पट्टा करवाने, ठेका दिलाने, स्थानान्तरण करवाने अथवा रूकवाने आदि बहुत से कार्य करवाने आदि का ठेका लेकर अच्छी खासी दलाली चमाका रहे है। दिलचस्प बात यह है। कि इनके बिछायें हुये जाल में वहीं फसते है। जो अपने को सबसे बड़ा सयाना समझते है। इन सयानों को यही तथकथित पत्रकार चपटे की तरह खून चूस कर छोड देते है। जबकि इनकी असलियत की जांच की जाये तो यह तथाकथित पत्रकार लिखने में जीरो है और तालमेल मिलाने में हीरो है। क्षेत्र में तो कुुछ ऐसे पत्रकार पनप चुके हैं जो पत्रकारिता की आण में गाडिय़ां चलवाते हैं।
पत्रकारिता का रौब दिखाकर पंचायत सेक्रेट्रियों से विज्ञापन के नाम पर वसूली करते हैं। जब कि देखा जाए तो इन्ही तथाकथित पत्रकारों की यह घिनौनी करतूत असली पत्रकारों के लिए परेशानी का सबब बनी हुई है। जब कभी पुलिस द्वारा वाहन चेकिंग अभियान चलाया जाता है। तो प्रेस व पत्रकार लिखा होने का फायदा उठाकर यह तथाकथित पत्रकार बच जाते हैं। क्योंकि यह तथाकथित पत्रकार इतने सातिर है की इनकी लच्छेदार भाषा शैली तथा मिल बाट कर खाने वाली प्रणाली के चलते इनकी पुलिस विभाग से लेकर सभी महत्वपूर्ण विभागों तक इनकी पहुँच होती है। जबकी न तो इनके पास लाइसेन्स रहता है और न ही जिस गाड़ी से चलते है उसका बीमा।
कई बार इन तथाकथित पत्रकारों पर नकेल कसने के लिए पुलिस अधिक्षक द्वारा पहल की बात कही गई। लेकिन फिल हाल अभीतक अमल में नही आया है इन फर्जी पत्रकारों तथा पत्रकारिता की आड़ में कर रहे दलाली वाले तथाकथित पत्रकारों की वजह से अपने पेसे को मिशन मान कर जुटे पत्रकारों की कलम भी कलंकित हो रही है।

जनता हलाकान-परेशान, मौज में है नगर पालिका के पहलवान

जनता हलाकान-परेशान, मौज में है नगर पालिका के पहलवान

राष्ट्रचंडिका/इतिहास में नगरपालिका के गठन से लेकर आज तक की सबसे भ्रष्ट नगरपालिका अगर वर्तमान परिषद् को कहे, तो कोई अतिशयोक्ति न होगी। यह पहली ऐसी नगरपालिका है जहाँ जनप्रतिनिधि अपने कामो के लिए रोते और अधिकारी मौज में नजर आ रहे है। बताया तो यहाँ तक जाता है कि यहाँ वर्षो से जमे अधिकारी अब ठेकेदारी से लेकर सप्लाई के काम तक स्वयं कर रहे है। अफसरशाही की शिकायत समय समय पर मीडिया के माध्यम से बाहर आती रही है किंतु भाजपा की सरकार के होते भाजपा के जनप्रतिनिधियों की हालत बहुत खऱाब है। सडक़ नाली निर्माण प्रकाश पानी और सफाई जैसी मुलभूत आवश्यकता भी अब पूरी नहीं हो रही है। बताया जाता है कि कुछ ख़ास पार्षदों को जो अधिकारियो के करीब है उनको आँख बंद करके रेवड़ी बांटी जा रही है। जैसे शहीद वार्ड में अवैध निजी कालोनियो में नपा सिवनी विधुत पोल लगा दिए है, अगर इस मामले की प्रारम्भ से जांच की जाये तो इतना बड़ा भ्रष्टाचार उजागर होगा की आंखे फट जायेगी। नपा ने वर्तमान जल आवर्धन की पाइप लाइन भी अवैध कालोनियों में कालोनाइजर से साठगांठ कर बिछा दी है। ज्ञात होवे की उक्त खर्च जो नपा ने किया है वो कालोनाइजर का कार्य है, पर नगद नारायण के आगे सब ढेर हो गए। सीएमओ के सामने ही लोकायुक्त ने एक कर्मचारी को रंगे हाथों रिश्वत लेते पकड़ा, ये वर्तमान नपा की उपलब्धि मानी जा रही है क्योंकि आज तक ऐसा हुआ नहीं था। शिकायते इतनी है कि यदि हर स्तर पर कार्यवाही की जाती है तो हर टेबल पर समस्या आ पड़े। गर्मी के मौसम में पानी की समस्या प्रति वर्ष आती है पर जिस प्रकार से निश्चिन्त इस वर्ष नपा थी वो समझ के परे है हर वार्ड में पानी को लेकर हाहाकार मचा हुआ है। जबकि मोटर सुधार के नाम पर इतने पैसे निकाल जा चुके है कि कचड़ा मशीनों की जगह नई टेक्निक की मशीनें उतने व्यय में ली जा सकती थी। मोटर सुधार भी नपा के अधिकारियों की आय मुख्य जरिया बताया जाता है। जनता को खून के आँशु बहाने पर मजबूर करने वालो को जनता शायद ही भूले और इसका परिणाम आने वाले विधानसभा चुनावों में पुन: देखने को मिल सकते है।

आरोप के बाद भी करोसिया पर मेहरबानी

लग चुके हैं कई गंभीर आरोप, पूरी नगर पालिका है मौन

आरोप के बाद भी करोसिया पर मेहरबानी

राष्ट्रचंडिका/सिवनी। नगर पालिका परिषद सिवनी में भ्रष्टाचार चरम सीमा पर है उसका मुख्य कारण है कि अधिकारी तो अधिकारी लिपिक एवं बाबुओ का राज चल रहा है। नगर पालिका में हाल ही में दो बाबुओ पर लोकायुक्त एवं अन्य कार्यवाही में गाज गिरी लेकिन आज भी यहां की व्यवस्था जस की तस बनी हुई है। नगर पालिका में अगर आपको कोई कार्य कराना है तो आप कहीं और ना जाकर अगर यहां के वरिष्ठ लिपिक का प्रभार संभाल रहे संतोष करोसिया के पास चले जायेंगे तो आप के सारे आड़े-तिरछे सभी काम आसानी से हो जायेंगे।
करोसिया के पास हर काम कराने की मास्टर की है वे नगर पालिका के के हर विभाग में काम सुलभता से कराना जानते है और इसके एवज में आपको क्या करना है यह बताने की आवश्यकता नहीं है। करोसिया के पूर्व केसियर का दायित्व महेश यादव संभालते थे और उन्होंने अपनी बेदाग छवि के साथ सेवानिवृत भी हुए लेकिन उनके रिटायरमेंट के बाद सीएमओ और अन्य अधिकारियों की एप्रोच से इन्हें मुख्य लिपिक का दायित्व सौंपा गया और अपनी कार्यकुशलता मे ंनिपुण कोई भी सही गलत कार्य को अंजाम तक पहुंचाने में इनके साथ साथ अधिकारी भी शामिल है।
संतोष करोसिया की कार्यप्रणाली से तंग आकर अनेक कर्मचारियों ने इनका विरोध भी किया लेकिन पालिका के अधिकारियों ने एक ना सुनी और ना तो इन्हें हटाया और ना कार्यवाही की। अनेक ऐसे बिल है जिन्हें बड़ी सफाई के साथ पास करना और अपने साथ साथ अधिकारियों को भी उपकृत करना आम बात है। चाहे मजदूरों को सफाई कर्मचारियों के पेमेंट के मामले में इतनी सफाई के साथ फर्जी बिल बाऊचर बनाये जाते है कि सूक्ष्मता से जांच करने पर भी कोई इनकी चोरी ना पकड़ सके।
अपने खिलाफ कोई बात ना उठे इसलिए कुछ गिने चुने समाचार पत्रों को भी विज्ञापन के माध्यम से उपकृत करते रहते हैं। आखिर इतनी भ्रष्ट कर्मचारी के खिलाफ आखिर पार्षद, उपयंत्री एवं जनप्रतिनिधि या विपक्षी दल आवाज कयों नहीं उठाते। अगर समय रहते इन्हेंं नही ंहटाया गया तो ये सुरसा की तरह पूरी नगर पालिका को चट कर जायेगा।

Friday, 14 April 2017

भ्रष्टाचार के पर्याय बने सीएमओ


भ्रष्टाचार के पर्याय बने सीएमओ

सिवनी राष्ट्र चंडिका/ नगर को सुविधा प्रदान करना और सुंदर बनाना नगर पालिका का काम है लेकिन जब से सीएमओ किशनसिंह ठाकुर आये हैं तब से यहां पर लोगों को सुविधा और सौंदर्यीकरण की कल्पना भी करना मुश्किल हो गया है। जगजाहिर है कि नगर में भ्रष्टाचार चरम सीमा पर है नगर पालिका परिषद के दो कर्मचारी इस मामले में लोकायुक्त एवं अन्य जांच में दोषी भी पाये गये। प्रश्र यह है कि अगर सीएमओ ने लंबे समय से हो रहे इन मामलो को संज्ञान लिया होता तो इन मामलो में भी दूध का दूध पानी का पानी होने में समय नहीं लगता।
प्राप्त जानकारी के अनुसार नगर में वाटर सप्लाई से पूर्व पानी की शुद्धता के लिये जिस कंपनी का प्रमाण पत्र लगाकर मानक पानी की बात कही जा रही है उस मामले में भी अगर सूक्ष्मता से जांच की जाती है तो जो तथ्य सामने आयेंगे वे चौकाने वाले हो सकते हैं क्योंकि ऐसी कंपनी ही नहीं है जिसका प्रमाण पत्र इस हेतु लगाया गया है।
सीएमओ ठाकुर पर यह भी आरोप है कि वे उच्चाधिकारियों के साथ उठते बैठते हैं इसलिए उन पर कोई कार्यवाही एवं जांच नही बैठायी जाती। अपने निकटतम ठेकेदारो उपयंत्रियों को निर्माण के कार्य देकर उपकृत कर इसके एवज में अपना निश्चित कमीशन लेना आम बात है। पार्षद दलों के सम्मिलन में अनेको बार पार्षदों ने भी यह आरोप लगाया है कि उनके कार्यकाल में ना तो समय सीमा में कोई कार्य पूर्ण हो पाता है और जो स्वीकृत कार्य है उन्हें भी सीएमओ द्वारा अनुमति नहीं दी जाती। ज्ञात हो कि सीएमओ श्री ठाकुर का स्थानांतरण दमोह हो जाने के बाद भी आखिर किसके इशारे पर टिके है और वे स्वयं यहां से क्यो नहीं जाना चाहते? ऐसे अनेक सवाल है।
नगर की सफाई व्यवस्था और इसके लिए उपयोग किये जाने वाले वाहनों में डाला जाने वाला डीजल की लाकबुक देखने पर शहरवासियों को भी सीएमओ के भ्रष्टाचार की कलई खुलने में ज्यादा समय नहीं लगेगा। नगर को नंबर 1 बनाने एवं स्वच्छ भारत के नाम पर शासन के करोड़ो रूपये आने के बाद भी नगर पालिका के निकट ही गंदगी का आलम बना हुआ है जिसका उदाहरण नगर पालिका के सामने बहने वाला नाला के रूप में देखा जा सकता है इतना ही नहीं थोक सब्जी मंडी जो नगर पालिका के ठीक पीछे होने के बावजूद यहां पर फेंकी जाने वाली सब्जी का निष्ठावान ना होने से नगर पालिका सहित आसपास क्षेत्र में प्रदूषण फैल रहा है इसके लिए भी सीएमओ दोषी है अगर वे चाहते तो स्वच्छता अभियान की शुरूआत वही से करते लेकिन उन्हें तो यहां पर पैसे कमाने से फुर्सत नहीं है।

Sunday, 9 April 2017

सिटी में बिक रहा है धीमा जहर

- फलों को चमकाने के लिए हो रहा ग्रीस का उपयोग - कार्बाइट और दूसरे केमिकल्स से पकाए जा रहे फल

सिटी में बिक रहा है धीमा जहर

राष्ट्रचंडिका/ शहर के बाजार में इन दिनों फल के दाम आसमान पर हैं। इसके बावजूद शहर में इनसे बना जूस सस्ते में मिल रहा है। इस बात से स्पष्ट है कि जूस के नाम पर लोगों को दुकानदार एसेंसयुक्त जूस बेच रहे हैं। शहर में खुलेआम सेहत से खिलवाड़ होने के बावजूद अधिकारी कोई कार्रवाई करते नजर नहीं आ रहे हैं। बाजार में 10 से 20 रुपए तक में फल के जूस के नाम पर एसेंस बिक रहा है।
गर्मी के कारण इन दिनों किसी भी बाजार या शहर के प्रमुख मार्ग पर चले जाइए, हर जगह शीतल पेय व जूस की दुकानें नजर आ जाएंगी। दोपहर से देर रात तक इन दुकानों पर लोग आ रहे हैं। ये सस्ते जूस लोगों की सेहत बिगाड़ रहे हैं।विभिन्न चौराहों व मार्गों पर जूस, मिल्क शेक, शर्बत आदि की कई दुकानें हैं। सभी में एसेंस व कलर वाला जूस ही बिक रहा है।
मिलावटी जूस का गणित
बाजार में 20 से 30 रुपए में एसेंस कलर की 5 से 10 ग्राम की शीशी आती है। यह ओरेंज, केवड़ा, पाइनेपल, मैंगो सभी फ्लेवर में उपलब्ध हैं। एसेंस कलर की एक शीशी से 20 लीटर तक शर्बत-जूस तैयार हो सकता है। जिसको 10 और 20 रुपए प्रति एक गिलास के हिसाब से दुकानदार मीठे पानी में घोलकर बेच रहे हैं। बाजार में मौसमी 60 से 70 रुपए किलो है।
एक किलो मौसमी में तीन गिलास जूस बनता है। वह भी अच्छी किस्म के हो तब। वहीं अनार 60 से 80 रुपए किलो के भाव बिक रहा है। यदि घर में जूस निकालें तो एक किलो अनार में तीन गिलास जूस ही निकलता है। आम वर्तमान में 80 से 120 रुपए किलो तक बिक रहे हैं। एक किलो आम से 5 गिलास जूस बन सकता है। वहीं एक किलो आम रस में दूध मिलाने पर 5 से 6 ग्लास शेक बनता है। दूध, आम और चीनी की कीमत जोड़ें तो एक गिलास कम से कम 25 रुपए में पड़ता है, जबकि बाजार में 10 और 20 रुपए प्रति गिलास बाजार में बेचा जा रहा है।
लस्सीआज कल मार्केट में सिंथेटिक लस्सी का चलन भी बढ़ा है। दूध गर्म करते समय ब्लॉटिंग पेपर डालकर आंच में घुमाया जाता है इससे वह गाढ़ा हो जाता है। फिर इससे दही जमाने से कम दूध से भी अधिक दही बन जाती है। लस्सी को और अधिक गाढ़ा करने के लिए उसमें आरारोट व पोस्टर कलर का इस्तेमाल कर लेते हैं। शक्कर की बढ़ती कीमत के कारण दुकानदार सेक्रिन का इस्तेमाल करने से नहीं चूकते। इस तरह से तैयार होने वाली लस्सी स्वास्थ्य को बुरी तरह से नुकसान पहुंचाती है।
मैंगो जूस
आम के नाम पर मिलने वाले मैंगो जूस में भी मिलावट होती है। मैंगो जूस में मैंगो एसेंस, सिंथेटिक दूध, सेक्रिन, अधिक मात्रा में बर्फ व पानी डाला जाता है। ये मैंगो जूस कुछ समय के लिए तो स्वादिष्ट लगता है लेकिन पेट में जाने के बाद यह कई तरह की बीमारियों को जन्म देता है। सिंथेटिक दूध में न तो कैल्शियम होता है और न ही विटामिन। कई लोगों को सिंथेटिक दूध से बनी चीजें पीने से एलर्जी भी हो सकती है। सेक्रिन बहुत ज्यादा मीठा करने के लिए होता है। कैलोरी होती है। इसके साथ ही जूस में प्रयोग होने वाला सेक्रिन के थोड़े से प्रयोग से ही ड्रिंक बहुत ज्यादा मीठा हो जाता है। पर सेक्रिन में मिला केमिकल जब शरीर में जाता है तो आंत और डाइजेशन सिस्टम को बिगाड़ता है।
गर्मी का मौसम आ चुका है। धूप में घूमते हुए सिटी के चौराहों पर बिक रहे जूस को पीने का मन तो करता ही होगा। अगर आप भी गर्मी मिटाने और सेहत बनाने के लिए जूस पी रहे हैं तो ये आपके लिए नुकसानदायक साबित हो सकता है। क्योंकि इसमें मिलावट का रंग मिलने लगा है।
फलों में इंजेक्शन
केले, पपीता, आम, चीकू को पकाने के लिए इसमें कार्बाइट समेत अन्य केमिकलों का इस्तेमाल तेजी से किया जा रहा है। यही नहीं फलों को चमकाने के लिए ग्रीस, गाडिय़ों से निकल रहे आइल और मोम का धड़ल्ले से प्रयोग हो रहा है।

जूस भी खतरनाक
केमिकल में पकाए जाने वाले फलों का जूस भी उतना ही खतरनाक साबित हो सकता है जितने फल। ये आपको बीमारियां दे सकता है। असल में जूस को बनाने के लिए जो पानी उपयोग किया जाता है, वो भी शुद्ध नहीं है। इसमें मिलाई जाने वाली बर्फ भी साफ नहीं होती है। वहीं इसमें मिलाए जाने वाले फ्लेवर और कलर भी आपकी सेहत बिगाड़ सकते हैं।
हो सकता है कैंसर
डॉक्टर्स की मानें तो जिस तरह से फलों में कार्बाइट समेत अन्य केमिकल का इस्तेमाल किया जा रहा है, उनसे कैंसर रोग भी हो सकता है। वैक्सीनेशन के लिए उपयोग किए गए केमिकल्स और आयल में हाइड्रोकार्बनहोता है। ये धीमी गति से लेकिन गहरा असर करते हैं और बाद में गंभीर बिमारियों का कारण बन सकते हैं। इनसे लीवर डैमेज, कैंसर, नोजिया, गैस्ट्रोएंट्राइटिस आदि होता है। फूड पाइजनिंग से अस्थमा, लीवर की बीमारियां, आंतों का कैंसर होता है।
कैसे बनता है मिलावटी जूस -
रूड्डठ्ठद्दश जूस बनाने में धड़ल्ले से केमिकल एसेंस और सैकरीन का प्रयोग किया जा रहा है।
स्नस्स््रढ्ढ के नियम के अनुसार शक्कर की जगह सैकरीन का प्रयोग नहीं कर सकते।
कैसे बनाता है मिलावटी जूस :
दुकानदार कुछ आम के टुकड़े , ढेर सारा बर्फ, फिर मिलते है केमिकल (एसेंस ) जो टेस्ट को बड़ा देता है और जूस का रंग आम से भी ज्यादा पिला कर देता है और सैकरीन जो चीनी से सस्ता होता है।

Saturday, 1 April 2017

यथावत चलाई जायें शटल व फास्ट पैसेंजर

 साधारण गाड़ी के बदले एक्सप्रेस चलाकर किराये वसूलने के फार्मूले का विरोध 

  यथावत चलाई जायें शटल व फास्ट पैसेंजर 

अमर नौरिया/राष्ट्रचंडिका/ नरसिंहपुर/इटारसी जबलपुर रेलखंड पर चलायी जा रही इटारसी सतना शटल गाड़ी एवं इटारसी कटनी फास्ट पैंसेजर को आगामी 1 अप्रैल 2017 से एक नई गाड़ी एक्सप्रेस के रूप में चलायी जायेगी ।  क्षैत्र के लोगों को साधारण किराये के रूप में शटल व फास्ट पैंसेजर के बदले एक्सप्रेस गाड़ी  चलाकर उनसे साधारण किराये के बदले एक्सप्रेस दर से किराये बसूले जाने के विरोध में जिले भर में विरोध प्रदर्शन का दौर चल पड़ा है । 
नरसिंहपुर जिला मुख्यालय पर रेलसंघर्ष समिति व कांग्रेस दल के अनेक पदाधिकारियों सहित  अनेक आम जनों ने इस बात को लेकर स्टेशन अधीक्षक नरसिंहपुर के माध्यम से रेल मंडल प्रबंधक वाणिज्य के नाम एक ज्ञापन सौंपकर शटल व फास्ट पैसेजर गाडी को यथावत चलाये जाने की मांग की और इस तरह से अगर रेल विभाग द्वारा जनता के हितों की अनदेखी की गई तो भविष्य में बड़े आंदोलन की चेतावनी भी दी गई 
इस संबंध में प्राप्त जानकारी के अनुसार रेल मंत्रालय के एप्रूवल रेल्वे बोर्ड के एक पत्र के अनुसार दिनांक 14 मार्च 2017 की अनुशंसा के आधार पर रेल मंत्रालय से 51671/72 इटारसी कटनी  51767/68 इठारसी  सतना गाड़ी को समायोजित करते हुये इटारसी सतना इटारसी एक्सप्रेस  11273/11274 गाड़ी का संचालन किया जावेगा । 
इटारसी जबलपुर रेलखंड पर संचालित की जा रही शटल व फास्ट पैसेंजर आम जनता जिसमें मजदूर पेशा सहित कम दूरी की यात्रा करने वाले व इलाज आदि जाने वाले लोगों के लिये यह गाडिय़ा काफी किफायती रहती थी किंतु जिस तरह से रेल विभाग ने इन दोनों गाडिय़ों को बंद कर इनके स्थान पर एक्सप्रेस गाड़ी के रूप में किराये बसूले जाने की जो प्रक्रिया अपनाई गई है व आम जनता के गले नहीं उतर रही है । और इससे होने वाली परेशानियों को लेकर आम जनता में रेल विभाग के इस तुगलकी निर्णय का विरोध स्पष्ट तौर पर देखने को मिल रहा है वहीं इस मामले में क्षैत्रीय जनप्रतिनिधियों की चुप्पी भी जले पर नमक छिड़क रही है । 

सिवनी में तेल के अवैध कुएं

सिवनी में तेल के अवैध कुएं

राष्ट्रचंडिका/सिवनी /सिवनी के बाज़ार में ब्रांडेड ऑईल के बदले नकली  तेल की पैकिंग की खबरें वाकई चिंता का कारण बनती जा रही हैं। कहा जा रहा है कि टैंकर्स के जरिये तेल सिवनी पहुंच रहा है और फिर उसे चुनिंदा कंपनियों के पांच से लेकर पंद्रह लिटर तक के डिब्बों में पैक कर बेचा जा रहा है। यह स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ ही माना जा सकता है।

पिछले साल पड़ोसी जिले छिंदवाड़ा में अनेक व्यवसायियों के पास से नकली तेल जप्त किया गया था। इस आशंका को निराधार कतई नहीं माना जा सकता है कि सिवनी में भी छिंदवाड़ा के मानिंद ही तेल की पैकिंग हो रही हो। पिछले साल ही लखनादौन में एक व्यवसायी के प्रतिष्ठान से बड़ी तादाद में तेल और कंटेनर्स जप्त किये गये थे।
देखा जाये तो इस तरह से तेल का व्यवसाय करने वाले लोग तो मोटा माल काटते हैं पर इससे सरकारी राजस्व को करों की जो चोट लगती है उसकी भरपाई शायद नहीं हो पाती हो। हो सकता है कि इसके लिये व्यवसायियों द्वारा खाद्य, औषधि प्रशासन आदि जिम्मेदार विभागों को लक्ष्मी आदि के जरिये साध लिया जाता हो किन्तु व्यवसायी यह भूल जाते हैं कि इस तरह के अपमिश्रित तेल से लोगों के स्वास्थ्य प्रर कितना प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।
चर्चाओं पर अगर यकीन किया जाये तो बुधवारी बाज़ार, गंज, शंकर मढिय़ा सहित अनेक स्थानों पर ब्रांडेड कंपनियों के पांच से पंद्रह लिटर के कंटेनर्स में नकली अपमिश्रित तेल को पैक कर उसमें बाकायदा कंपनी की सील लगा दी जाती है। यह तेल नागपुर के जरिये सिवनी पहुंच रहा है। यह बात कितनी सच है यह तो कहा नहीं जा सकता है कि पर अगर कहीं धुंआ दिख रहा है तो कहीं न कहीं आग अवश्य ही लगी होगी।
यक्ष प्रश्न तो यह है कि नागपुर से सिवनी आते वक्त इन टैंकर्स को खवासा एवं मेटेवानी की विक्रय कर, पुलिस, परिवहन विभाग, मण्डी आदि की जांच चौकियों पर से होकर गुजऱना होता होगा। अगर ये खबरें सही हैं तो आम जनता अंदाज़ा लगा सकती है कि प्रदेश के सरकारी सिस्टम में किस तरह घुन लग चुका है कि एक दो नहीं आधा दजऱ्न विभागों की आँखों में कथित तौर पर धूल झोंककर व्यवसायियों द्वारा इस तरह के कार्य को अंज़ाम दिया जा रहा है।
अगर इन बातों में दम नहीं है तो खाद्य एवं औषधी प्रशासन ही अपना पक्ष स्पष्ट कर जनसंपर्क विभाग के माध्यम से इस बात को सार्वजनिक करे कि पिछले एक वर्ष में उसके द्वारा कितनी ब्रांडेड कंपनियों के तेल के कंटेनर्स को सील कर परीक्षण के लिये प्रयोग शाला में भेजा गया है? जाहिर है इस सवाल के जवाब में फूड एण्ड ड्रग्स डिपार्टमेंट को पसीना आ जायेगा।
संवेदनशील जिला कलेक्टर धनराजू एस. से अपेक्षा ही की जा सकती है कि इस दिशा में संज्ञान लेकर संबंधित महकमों को निर्देशित करें कि वे समय सीमा में सैंपल लेकर, छापेमारी कर इस तरह के घिनौने काम को रूकवायें। 

Saturday, 25 March 2017

दवा कंपनियां डॉक्टरों को देती हैं कैश गिफ्ट, कराती हैं विदेश यात्रा

दवा कंपनियां डॉक्टरों को देती हैं कैश गिफ्ट, कराती हैं विदेश यात्रा

राष्ट्रचंडिका/ इसलिए बढ़ते हैं दामडॉक्टर्स को नकद राशि, विदेश यात्रा और मनमर्जी के गिफ्ट बांटकर उनसे ब्रांडेड दवाओं को प्रमोट करवाने वाली देश-विदेश की बड़ी दवा निर्माता कंपनियों को अब तगड़ा झटका लगने वाला है। केंद्र सरकार, डिपार्टमेंट ऑफ फॉर्मास्यूटिकल, मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया एक कोड ऑफ कंडक्ट लाने जा रही हैं। इसके तहत डॉक्टर दवा कंपनियों से 1 हजार से अधिक का गिफ्ट नहीं ले सकते। अगर लेंगे तो बड़ी कार्रवाई तय है। दरअसल दवा कंपनियों-डॉक्टरों की मिलीभगत को रोकने के लिए नियमों में संशोधन की तैयारी है। इससे डॉक्टर्स, दवा कंपनियों में हड़कंप मच गया है। दवा कंपनियों के सूत्र बताते हैं कि डॉक्टर्स को सुविधाएं देने के चलते ही दवाओं के दाम बढ़ते हैं।मिली जानकारी के मुताबिक आने वाले नियम डॉक्टर्स से लेकर कंपनी, होलसेलर्स, डिस्ट्रीब्यूटर्स पर भी लागू किए जा सकते हैं। छत्तीसगढ़ के सरकारी अस्पतालों में डॉक्टर्स को जेनेरिक दवाएं ही लिखने की इजाजत है। इसके बावजूद अस्पतालों में निजी कंपनियों के मेडिकल रिप्रजेंटेटिव (एमआर) मिल जाएंगे। डॉक्टर भी इन्हें ओपीडी समय में दवाओं को डिस्प्ले की इजाजत दे देते हैं, जो राज्य सरकार के नियमों का उल्लंघन है। 

आज भी सरकारी डॉक्टर 50 फीसदी ही जेनेरिक दवाएं लिखते हैं। कंपनियां बताएंगी डॉक्टर्स पर किया कितना खर्च- कंपनियां डॉक्टर्स को रिसर्च वर्क, कॉन्फ्रेंस के नाम पर फॉरेन टूर करवाती हैं। अब नए नियमों के तहत कंपनियों को डॉक्टर्स पर हुए खर्च की जानकारी सार्जवनिक करनी होगी।2016 में केंद्र को भेजा था जुर्माना-डॉक्टरों के लिए नियम-कानून तय करने वाली राष्ट्रीय संस्था मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (एमसीआई) ने 2016 में केंद्र सरकार को डॉक्टर्स के विरुद्ध जुर्माने (पनिस्मेंट) का प्रस्ताव भेजा था। यह पहली बार ही था कि गिफ्ट लेकर ब्रांडेट दवा लिखने वाले डॉक्टर पर जुर्माना तय है। गाइड लाइन के अनुसार डॉक्टर गिफ्ट लेता है तो गिफ्ट की कीमत के मुताबिक जुर्माना लगेगा। 5 हजार से 10 हजार के गिफ्ट पर इतना ही जुर्माना, नेशनल और स्टेट काउंसिल से 3 माल के लिए निलंबन। इसके अधिक के गिफ्ट पर जुर्माना, निलंबन का प्रावधान है।.
कंपनियों से पैसे लेकर दवा लिखते हैं डॉक्टरडॉक्टरों को भगवान का दर्जा दिया गया है. यह सच है. कई डॉक्टरों ने कई मौकों पर यह साबित किया भी है, कर भी रहे हैं. हम भी डॉक्टरों को इसी नजरिये से देखते हैं. उनके प्रति पूरी निष्ठा और आस्था रखते हैं. पर जिस तरीके से राजनीति में गिरावट आयी है, पत्रकारिता में गिरावट आयी है, यह पेशा भी इससे अछूता नहीं है. कुछ डॉक्टरों ने अपने इस पवित्र पेशे को धंधा बना दिया है. कहते हैं, धंधे में कुछ न कुछ उसूल तो होते हैं, पर इन डॉक्टरों के लिए ऐसा कुछ भी नहीं. डॉक्टरों को अपना पेशा शुरू करने से पहले हिप्पोक्रेटिक ओथ (एक तरह की शपथ) लेनी पड़ती है. पर ये डॉक्टर पैसों के लिए कुछ भी करने को तैयार रहते हैं.हम यहां यह स्पष्ट करना चाहते हैं कि सभी डॉक्टर ऐसे नहीं हैं. अधिकतर डॉक्टर अपनी जिम्मेदारी का बेहतर निर्वहन कर रहे हैं. हम इन डॉक्टरों के प्रति पूरी निष्ठा रखते हैं और इनका आदर करता है. हम यह भी स्पष्ट करना चाहते हैं कि हमारा मक़सद किसी पर दोषारोपण करना नहीं, बल्कि व्यवस्था कैसे सुधरे, इस पर जोर देना है.
डॉक्टरों पर नजऱ रखने के लिए मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया है. डॉक्टरों का संगठन आइएमए भी है. यह उनकी जिम्मेवारी है कि वे गलत डॉक्टरों को सामने लायें, उन पर कार्रवाई करें.दवा के कारोबार में थ्री सी (कन्विंश, कन्फ्यूज्ड, करप्ट) की परिभाषा अब बदल गयी है. पहले मेडिकल रिप्रजेंटेटिव (एमआर) से कहा जाता था.. डॉक्टरों को पहले कन्विंश करो. सफल नहीं हुए, तो कन्फ्यूज करो. इसमें भी सफल नहीं हुए, तो उन्हें करप्ट बनाओ. यानी भ्रष्ट बनाओ. अब इनमें से पहले दो 'सीÓ यानी कन्विंश और कन्फ्यूज्ड के कोई मायने नहीं हैं. सिर्फ कहा जाता है : डॉक्टरों की चिरौरी मत करो. 30 फीसदी मांगता है, तो 35-40 फीसदी दो. पर यह सुनिश्चित करो कि डॉक्टर हमें बिजनेस दे. इसका असर यह होता है कि गलत करनेवाले डॉक्टर उसी कंपनी की दवा लिखने को बाध्य होते हैं, जिनसे वे उपकृत होते हैं. चाहे उसी मोलिक्यूल की दूसरी कंपनियों की दवा सस्ती क्यों न मिलती हो.– दो तरह की मार्केटिंगदवा की दो तरह की मार्केटिंग होती है. इथिकल और अन इथिकल. इथिकल मार्केटिंग, जो अब नहीं के बराबर होती है, में पहले होता था : एमआर डॉक्टरों के पास जायें. प्रोडक्ट के बारे में बतायें. मोलिक्यूल बतायें. सैंपलिंग करें.छोटा-मोटा गिफ्ट दें. जैसे पेन, डायरी, की-रिंग. कभी-कभी पंखा, फ्रीज जैसे गिफ्ट भी डॉक्टरों को दें. कई डॉक्टर ऐसे थे, जो गिफ्ट भी वापस कर देते थे. कुछ डॉक्टर एमआर का इंतजार भी करते थे, ताकि उन्हें नये प्रोडक्ट की जानकारी मिल सके. अन इथिकल मार्के टिंग में बिजनेस बढ़ाने के लिए कंपनियां सब कुछ करती हैं, चाहे इसका असर आम लोगों पर कुछ भी पड़े. चाहे 90 रुपये (स्टॉकिस्ट का रेट) की दवा 600 रुपये में रोगियों को क्यों न बेचनी पड़े.* सेल्स प्रमोटर बन गये डॉक्टरदवा मार्केटिंग की नीति प्रत्यक्ष तौर पर बेहद साफ-सुथरी व नियमपूर्ण प्रतीत होती है. आज भी एमआर डॉक्टरों की क्लिनिक में उसी तरह विजिट करते हैं, अपने प्रोडक्ट के बारे में बताते हैं और दवा लिखने का भी आग्रह करते हैं. मगर अब फिजिशियंस सैंपल बहुत कम दिये जाते हैं. ज्यादातर डॉक्टरों को कंपनी की दवाओं की एक फेहरिस्त थमा दी जाती है. बस इतना सा इशारा जरूर कर दिया जाता है कि दवा कंपनी आपकी सेवा के लिए तत्पर है. यह सेवा डॉक्टर की प्रिस्क्राइबिंग क्षमता के अनुरूप तय होती है. दवा कंपनियों के महीने भर के लक्ष्य तय होते हैं. इस वजह से वह अपने सेल्स में ज्यादा अनिश्चितता पसंद नहीं करतीं. कंपनियां चाहती हैं कि डॉक्टर के साथ एक डील हो, ताकि महीने का लक्ष्य मिल जाये. इस डील का स्वरूप अकसर डॉक्टर की जरूरतों के अनुसार तय होता है.सीधे आर्थिक लाभ के रूप में, टूर पैकेज के रूप में या फिर किसी महंगे उपहार के रूप में. इस तरह से डॉक्टर का इस्तेमाल सीधे तौर पर एक सेल्स प्रमोटर के रूप में होता है.
फुटकर दवाइयां लिखनेवाले डॉक्टरों की बजाय कंपनियां ऐसे डॉक्टरों को पसंद करती हैं, जो सीधे तौर पर व्यावसायिक संबंध रखते हैं. मगर हर दवा कंपनियों की लिस्ट में ऐसे दिलेर डॉक्टरों की संख्या सीमित होती है.इसके दो कारण हैं. पहला अधिकतर व्यस्त डॉक्टर एक की बजाय चार कंपनियों से उपकृत होना पसंद करते हैं. दूसरा, दवा कंपनियां भी सभी डॉक्टरों को ऐसे संबंधों के लायक नहीं समझतीं.* सबसे निरीह प्राणी एमआरइस सारी प्रक्रिया में मेडिकल रिप्रजेंटेटिव का प्रयोग शतरंज के एक प्यादे की तरह होता है. इस पूरे तंत्र का सबसे निरीह प्राणी एमआर होता है. महीने भर के टारगेट का दबाव उसी पर होता है. डॉक्टरों की बेरुखी, उनका अनमनापन, प्रॉडक्ट के प्रति अरुचि, सेल्स में अपने सीनियरों का लगातार व्यस्त रहने का दबाव, यानी सब कुछ.– देश में करीब 25 हजार दवा कंपनियां हैं* हजारों कंपनियां फूड सप्लिमेंट के नाम पर भी दवाइयां बनाती हैं* टॉप सेगमेंट की करीब सौ कंपनियों का बाजार पर आधिपत्य– डॉक्टर किस तरह से लेते हैं पैसे1. दवा कंपनियां ही पहले विश्व भर में होनेवाली कांफ्रेंस का पता करती हैं. फिर टारगेटेड डॉक्टरों के पास अपने दूत भेजती हैं, जो डॉक्टर की यशगाथा गाते हुए उन्हें आने-जाने का विमान खर्च, घूमने-फिरने और ठहरने की राजसी व्यवस्था का प्रस्ताव देते हैं. कभी-कभी कुछेक डॉक्टर भी अपने प्रस्ताव दवा कंपनियों के सामने रखते हैं. यदि 10 कंपनियों के सामने उन्होंने प्रस्ताव रखे और पांच ने उनके लिए विमान का खर्च उठाने की सहमति जता दी, तो डॉक्टर सहर्ष तैयार हो जाते हैं. पांचों से विमान का टिकट लिया.  चार रद्द करा कर उसके पैसे रख लिये. एक पर चले गये. दूसरी कंपनियों ने उनकी अन्य व्यवस्था कर ली. यदि किसी एक कंपनी ने ही डॉक्टर के सेमिनार की सभी व्यवस्था कर दी, तो किसी दूसरी कंपनी ने उन्हें टूर पैकेज दे दिया. हां, इसके एवज में कंपनियों को कुल खर्च का कम से कम चार गुना बिजनेस देना ही पड़ता है. यानी उस कंपनी की दवा लिखनी ही पड़ती है.2. कंपनियां अपने एमआर के माध्यम से जब डॉक्टरों से संपर्क करती हैं, तो वे (डॉक्टर) सिर्फ यह पूछते हैं.. आप देंगे क्या. क्या आपके पास पावर है? फिर डील फाइनल होती है. कुछ कंपनियों ने तो एमआर को भी फाइनांसियल पावर दे दिया है. कंपनियां ब्लैंक चेक भी भेज रही हैं. डॉक्टर ने बिजनेस दिया, तो भुगतान कर दो.3. डॉक्टर विदेश टूर धड़ल्ले से लेने लगे हैं. अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, स्विटजरलैंड, ब्रिटेन का भी. न सिर्फ अपना, बल्कि पत्नी व बच्चों का भी. यह सब काम बड़ी दवा कंपनियां कर रही हैं. छोटी कंपनियां थाइलैंड, सिंगापुर, हांगकांग, यूएइ आदि के लिए ऑफर देती हैं.4. रांची के एक डॉक्टर से एक बड़ी कंपनी की डील हुई. कंपनी ने पूछा, तीन माह में कितना बिजनेस देंगे आप. डॉक्टर ने कहा : छह लाख तक, पर मुझे इसके एवज में कार चाहिए. उनके पास अगले ही दिन होंडा सिटी कार पहुंच गयी.– बच्चों के नाम से ले रहे चेकपहले डॉक्टर दवा लिखने के एवज में अपना हिस्सा नकद लेते थे. अब एकाउंट पेयी चेक से भी ले रहे हैं. पर यह चेक उनके खुद के नाम से नहीं रहता. पत्नी, बच्चे या किसी परिजन के नाम का होता है, ताकि उन्हें आयकर को हिसाब न देना पड़े. यानी टैक्स की भी चोरी.* 40 प्रतिशत तक मांग करते ह ैंएक डॉक्टर ने कंपनी से दवा लिखने के बदले 40 फीसदी रकम की मांग की. कहा : बाकी बात आप उस दुकान से कर लें, जहां आपकी दवा बिकेगी. दवा दुकानवाले ने कहा : मैं तभी आपकी दवा रखूंगा, जब आप हमें 26 फीसदी दें. मजबूरन उस कंपनी को यह व्यवस्था करनी पड़ी.– क्या कहता है आइएमएदवा कंपनियां चिकित्सकों को कैसे भ्रष्ट बना रही हैं, इस पर प्रभात खबर संवाददाता राजीव पांडेय ने झारखंड आइएमए के प्रेसीडेंट डॉ अरुण कुमार सिंह से बातचीत की. बातचीत के अंश :-डॉक्टर ब्रांडेड दवा क्यों लिखते है?ब्रांडेड दवाओं पर लोगों का विश्वास ज्यादा होता है. जेनेरिक दवाओं में सिर्फ कंपोजिशन होता है, जो मरीजों को आसानी से याद नहीं रहता. हालांकि मेडिकल काउंसिल की गाइड लाइन है कि जेनेरिक दवा ही लिखी जाये.* कंपनियां डॉक्टरों को रिझाने के लिए क्या-क्या करती हैं?हर कोई प्रोडक्ट बेचना चाहता है. दवा कंपनियां भी इसी जुगाड़ में रहती हैं कि उनके प्रोडक्ट की ज्यादा बिक्री हो. चिकित्सकों को किसी दवा कंपनी की मदद नहीं करनी चाहिए. आइएमए इसका विरोध करता है.* कंपनियां डॉक्टरों को पैसे भी देती हैं?दवा कंपनियां चिकित्सकों को गिफ्ट देती हैं. गिफ्ट कैसा होगा, यह कंपनी और चिकित्सक की प्रैक्टिस पर निर्भर करता है. चिकित्सक पैसे लेते हैं, ऐसी कोई जानकारी अभी तक नहीं मिली है.* कंपनियां टूर पैकेज भी देती हैं?सेमिनार में जाने के लिए दवा कंपनियां चिकित्सकों को टूर पैकेज देती हैं. कुछ चिकित्सक ही ऐसा करते हैं. कोई प्रैक्टिस छोड़ कर जाना नहीं जाना चाहता है. हर सिक्के के दो पहलू होते हैं. कोई टूर पैकेज लेकर घुमने जाता है, तो यह गलत है. डॉक्टरों को कंपनियों से सेमिनार में जाने के लिए पैसे नहीं लेने चाहिए. कंपनियां सुविधाएं देंगी, तो उसका फायदा भी उठायेंगी. जितना खर्च करेंगी, उससे कहीं ज्यादा का लाभ लेने का प्रयास करेंगी.* दवा लिखने पर डॉक्टरों को कमीशन मिलता है?ऐसी जानकारी 

कहां से आ रहा है पैसा इसकी भी हो जांच

कहां से आ रहा है पैसा इसकी भी हो जांच 

प्रदेश में देशविरोधी गतिविधियों पर अंकुश लगाने हो कारगर प्रयास 

राष्ट्रचंडिका/ नरसिंहपुर-  देश के अनेक हिस्सों में जारी पाक समर्थित आंतकवाद की वारदातें उसकी एजेंसी आईएसआई के द्वारा लगातार रची जा रही सजिशों से यह बात स्पष्ट तौर पर सामने आती कि देशविरोघी ताकतें अभी जड़े अब मध्यप्रदेश में भी जमा चुकी हैं । गत दिनों हुई भोपाल उज्जैन पैंसेजन ट्रेन में बम धमाके की घटना से भी यह इंकार नहीं किया जा सकता है कि कभी शांति का टापू कहा जाने वाला मध्यप्रदेश भी अब सुरक्षित नहीं रहा । 
दूसरे राज्यों के इनपुट के आधार पर सतना,जबलपुर और ग्वालियर सहित देश के अन्य राज्यों में पकड़े गये जासूसी नेटवर्क को संचालित करने वालों लोगों में जिस तरह के नाम और राजनीतिक दलों व संगठनों से संबंध सामने आये हैं उससे भी यह जाहिर होता है कि आईएसआई ने अब अपनी घुसपैठ  मध्यप्रदेश में मजबूती से बना ली है आईएसआई ने जिस तरह से अपने जासूसी नेटवर्क को मध्यप्रदेश में स्थापित किया था उससे यह बात और गंभीर हो जाती है । 
आतंकवाद और देशविरोधी घटनाओं की सजिशों को अंजाम तक पहुंचाने में प्रदेश में स्लीपर सेल सक्रिय होने क ी बात प्रदेश व देश की सुरक्षा एजेंसियों की जांच में आज नहीं तो कल सामने आयेंगी लेकिन महत्वपूर्ण बात यह भी है कि अब उन लोगों की  भी जांच की जाना चहिये जिससे कि छुपकर अपनी गतिविधियों को संचालित करने वाले जल्द से जल्द बेनकाब हो सकें  ।  नरसिंहपुर  में भी कुछ ऐसे लोग जो कुछ साल पहले छोटे छोटे झोपड़ो व मकानों में रहते थे वे आज लाखों रूपयों के मकान व मंहगी गाडिय़ों में घूम रहें हैं इनके काम धंधे भी ऐसे नहीं है कि उनके आधार पर चंद सालों में इनके द्वारा इतनी कमाई की गई हो इसके अलावा उनके ऐसे क्या व्यापारिक कामकाज है जिनकी बदौलत वे अपनी मंहगी जरूरतों को पूरा कर रहें हैं । ऐसे लोगों की हर राजनैतिक सामाजिक व अन्य गतिविधियों में बढ़चढ़कर हिस्सेदारी करना भी  अनेक संदेह को जन्म देता है आमतौर पर पुलिस द्वारा कई मामलों में कार्यवाही करने पर ऐसे लोगों को  संरक्षण मिल जाता है  ऐसी बातें भी जनचर्चाओं के माध्यम से सामने आती रहीं हैं इससे भी उनकी इन कारगुजारियों को बढ़ावा मिलता है सूत्रों की मानें तो नरसिंहपुर शहर में कुछ एक लोगों को  राजनैतिक व अन्य संगठनों के माध्यम से  बढ़ावा भी मिल रहा है  ।  इस तरह के लोगों की सोशल मीडिया में पोस्ट की जाने वाली तस्वीरें व कई और कार्यक्रमों की पोस्टों से भी इनके संपर्कोंं व इनकी कारगुजारियों व कामकाज को आसानी से देखा व परखा जा सकता है सूत्रों की मानें तो इनमें से कई लोग बीपीएल परिवारों के  सदस्य भी हैं किंतु इनके रहन सहन से इन्हें किसी भी प्रकार से गरीबी की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता है इनके लिये पैसा कहां से आ रहा है या इनके द्वारा किसके पैसे से ऐशो आराम की जिंदगी जी जा रहीं है इस पर नजर रखना वर्तमान समय में अत्यंत ही जरूरी है । 
इन लोगों पर संदेह करना या इनकी जांच करना जरूरी इसलिये हो जाता हेै कि अक्सर कई तरह के मामलों में पुलिस द्वारा की जा रही कार्यवाही के दौरान हर बार कुछ चंद लोगों का आरोपियों के समर्थन में खड़े होना व उनकी पैरवी करना और प्रदेश के अनेक ऐसे हिस्ट्रीशीटर व उनके आकाओं के नाम से लोगों के बीच अपने संपर्कों की बातें बताना । 
नरसिंहपुर जिले में पूर्व में भी देश विरोधी गतिविधियों में सम्मिलित लोगों  के संपर्कों को लेकर सुरक्षा एजेंसियों व पुलिस के द्वारा कार्यवाही की जा चुकीं हैं ऐसे में यह जरूरी हो जाता है  जिस तरह से आईएसआई का जासूसी नेटवर्क प्रदेश में सामने आया है ऐसे में नरसिंहपुर में भी सतर्कता बरतने की जरूरत है जिससे देश विरोधी ताकतें नरसिंहपुर में अपनी जड़े न जमा सकें । 

Saturday, 25 February 2017

रेत का अवैध खनन

रेत का अवैध खनन
  नर्मदा तट पिपरहा घाट से रातों रात हो रहा है
ग्रामीणों ने शिकायत कर रेत खनन को बंद किये जाने की मांग की
राष्ट्रचंडिका/नरसिंहपुर। जिले में नर्मदा सेवा यात्रा को लेकर गये हुये चंद दिन ही बीत पाये हैं और नर्मदा नदी में जिस तरह से अवैध खनन और प्रदूषण को लेकर जो दावे और बातें शासन और प्रशासन ने दोहराई थी वह सब हवा हवाई हो गई हैं ।
नर्मदा नदी में बहने वाली भारी मात्रा में जलीय वनस्पति का हाल यह है कि हर घाट में नर्मदा जल के ऊपर यह एक बड़ी परत के रूप में हर घाट पर भारी मात्रा में दिखाई दे रही है जिससे लोगों को पहले की तरह नर्मदा जल में नहाने आदि में भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है ।
नर्मदा में अवैध खनन को लेकर भी अनेक शिकायतें आने लगी हैं करेली जनपद पंचायत के अंतगर्त आने वाली गुरसी ग्राम पंचायत के पिपरहा गांव पर स्थित धुंआधार षाट पर पिछले चार पांच माह से रातों रात जारी लगातार अवैध खनन से नर्मदा तट पर एकत्रित रेत का बेतहाशा खनन किया जा रहा है इस संबंध में गांव के ही ग्रामीणों ने जिला कलेक्टर ,खनिज विभाग के अधिकारियों सहित पुलिस थाने में भी इस संबंध में शिकायत कर नर्मदा तट से किये जा रहे अवैध खनन को बंद कराये जाने की मांग की है ।
नर्मदा तट पर बसे इस पिपरहा गांव से ही आसपास के गांव व शहरों में ट्रेक्टर ट्रालियों से रेत भरकर ले जायी जा रही है जिसकों उंचे दामों पर बेचा जा रहा है इस संबंध में ग्रामीणों का कहना है कि जब रेत खनन करने वालों को रेत खनन करने से मना किया जाता है तो उनका कहना है कि वे कहते हैं कि जाओं जहां शिकायत करना है कर दो हमारा कोई कुछ नहीं बिगड़ लेगा हम सभी जगह पैसे देते हैं । इस तरही बातें जब सामने आती है तो इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि खनन करने वाले किस तरह से बैखौफ होकर मां नर्मदा को छलनी कर रहें हैं और अगर इस पर रोक नहीं लगाई गई तो अन्य घाटों की तरह  पिपरहा घाट से भी  रेत खनन कर इस घाट को भी रेतविहीन कर दिया जायेगा । 

जनता की अदालत में आज भी सवाल

जनता की अदालत में आज भी सवाल
क्यों लगे सुरक्षा में 300 पुलिसकर्मी
क्या दे पाये जवाब विधायक?
क्यों नहीं किया सम्मान वंदेमातरम कलाकारों का
राष्ट्रचंडिका/सिवनी। ‘सिवनी की अदालत’ यह शब्द किसी फिल्म का टाइटल सा प्रतीत होता है वैसे तो अदालत का अर्थ उस न्याय की देवी से है जो आंख में सिर्फ इसलिए काली पट्टी बांधती है जिससे वह न्याय करते समय अपने नाते रिश्तों को दरकिनार करते हुए न्याय कर सके लेकिन हाल ही में सिवनी के विधायक दिनेश राय ने जनता की अदालत का आयोजन किया जिसमें उन्होंने अपनी सुरक्षा के लिए पुलिस प्रशासन से लेकर अपने लखनादौन एवं अन्य क्षेत्र से ऐसे लोग बुला रखे थे जो यहां फिल्मी हस्तियों से मनोरंजन एवं सुरक्षा कवच का रोल अदा करने के लिए थे।
इस आयोजन के पूर्व उन्होंने जनता से सवाल रखने की बात कही थी लेकिन जैसे जैसे कार्यक्रम तिथि नजदीक आती गयी श्री राय का विरोध  भाजपा-कांग्रेस में गति पकडऩे लगा तो उन्होंने अपनी सुरक्षा के लिये प्रशासन पर दबाव बनाकर पुलिस विभाग से 300 से अधिक कर्मचारी अपनी सुरक्षा में तैनात कराये तथा प्रश्र पूछने वालों को कार्यक्रम स्थल में ही नहीं पहुंचने दिया और जब वे लोग वहां नहीं पहुंचे तो अपने चाटुकारी से जनमत संग्रहित कराया अब आप ही बताये कि क्या यही जनता की अदालत है।
जनता की अदालत का नाम देकर अदालत जैसे न्यायप्रिय शब्द का अपमान करना कहां तक न्यायसंगत है। अदालत में न्यायाधीश होते पैरवी करने को अधिवक्ता होते हैं और फरियादी के रूप में पीडि़त होते हैं लेकिन इस अदालत में पीडि़त जनता की फरियाद सुने बिना ही फैसला सुना दिया गया भले ही यहां पर न्याय करने वालों ने पीडि़तों के साथ अन्याय किया हो लेकिन ऊपर वालों का न्याय के सामने किसी की नहीं चलती।
आयोजन में अपने भाषणों में श्री राय ने जिस तरह से भाजपा नेता पर प्रश्र उठाया पल्लू की घटना को कांड का नाम दिया तथा अनेक यक्ष प्रश्रों का उल्लेख किया जो इतना निम्र स्तर का उदाहरण था जिसे शब्दों में व्यक्त करना शब्दों का अपमान होगा। इस आयोजन को स्वस्थ्य मनोरंजन का नाम दिया गया था क्या वहां बैठी जनता कैबरे की पोशा में मुंबई की बालाओं का नाचना जैसे कार्यक्रम को स्वस्थ मनोरंजन का नाम दे सकेगी? क्या आयोजन में आये ऐसे कलाकार नही थे जो सुरापान कर मंच पर भोड़ापन दिखा रहे थे ? क्या यह स्वस्थ मनोरंजन है। वंदे मातरम कार्यक्रम इस कार्य आयोजन का प्रेरणा स्प्रद पहलू था लेकिन दुर्भाग्य है कि मुंबई के कलाकारों को तो मंच पर सम्मानित किया गया लेकिन वंदेमातरम में आये कलाकारों को आयोजन के दौरान श्री राय ने सम्मानित भी करना उचित नहीं समझा। शायद श्री राय की देशभक्ति सिर्फ आयोजन तक सीमित थी। आयोजन के नाम पर मीडिया गैलरी में ऐसे अनेक फर्जी पत्रकारों को तो बैठाया गया लेकिन वास्तविक पत्रकारों को व्यवस्थाओं के साथ जद्दोजहद तक करनी पड़ी और आवेश को देखते हुए अंत में श्री राय के मीडिया प्रभारी ने वहां से हटना ही उचित समझा।

गुप्त रूप से जो मीडियाकर्मी विरोध करने वाले थे उन्हें मौन रखने के तमाम इंतेजाम भी किये गये जो कार्यक्रम के उपरांत उजागर हुआ। अगर जनता की अदालत का यह स्वरूप रखना है तो भविवष्य में ऐसे आयोजनों पर विराम लगाना ही ज्यादा उचित होगा शायद इस आयोजन के माध्यम से विधायक श्री राय अपने आपको राजा हरिशचंद बताना चाहते हैं अब सवाल यह है कि क्या राजा हरिशचंद बनना या जनता को उनके प्रति जनता की अदालत के परिणाम क्या देगी यह चिंतन का विषय है लेकिन रंग बिरंगे कार्यक्रम मनोरंजन तो कर सकते हैं मगर जनता आज भी उस घोषणा पत्र को अपने पास रखी है और जवाब मांग रही है कि क्या वास्तव में श्री राय ने अपना वायदा निभाया? 

नगर पालिका के पार्षद खुद ही बन गए ठेकेदार

नगर पालिका के पार्षद खुद ही बन गए ठेकेदार
राष्ट्रचंडिका/सिवनी नगर पालिका द्वारा जो काम ठेके पर दिए जाते हैं उनमें पार्षदों की क्या भूमिका रहती है यह जांच का विषय है।  जनता में इस बात की चर्चा रहती है कि कई वार्डों में पार्षदों द्वारा ही विकास कार्यों के बेनामी ठेके लिए जाते हैं। ठेका किसी अन्य के नाम से लिया जाता है और असल में सारा काम खुद पार्षद करवाते हैं। इसी कारण वार्डों में होने वाले सडक़, पगडंडी, रेलिंग, डंगे के सभी काम निम्न स्तर के हो रहे हैं। जिन पार्षदों को काम का स्तर देखना चाहिए वे कथित रूप से खुद ही ठेके ले काम कर रहे हैं यह भी जांच का विषय है।
ऐसा स्टाफ पार्षदों के दबाव में रहता है। पार्षद अपनी मर्जी से वार्ड के विकास कार्यों की योजना बनवाते हैं और खुद काम करवाते देखे जाते हैं।
     मुख्यमंत्री से आग्रह किया है कि पिछले सालों में नगर के वार्डों में हुए विकास कार्यों की जांच करवाई जाए कि इन कार्यों की योजना किस नीति-नियम से बनाई गई और किन ठेकेदारों द्वारा काम करवाया गया और उसमें पार्षदों की क्या भूमिका रही। जगह पार्षद अपने दोस्तों व संबंधियों को खुश करने के लिए ही काम करवाते हैं, आम जनता के हितों का ध्यान नहीं रखा जाता और न ही विकास कार्यों की प्लानिंग में स्थानीय जनता की भागीदारी रहती है। व्यक्ति विशेष के लाभ के लिए बड़े डंगे लगवाए जाते रहे हैं और आम लोगों के लिए रास्ते तक नहीं बनवाए जाते। सिवनी नगर पालिका के अध्यक्ष  भी बड़े दावे करने के बावजूद वार्डों के कामों में भ्रष्टाचार मिटाने के लिए कदम नहीं उठाए। उधर, सदस्यों के पास शिकायतें होती हैं तो वे भी समाधान नहीं करते।

Saturday, 11 February 2017

प्रेेम पं्रसग के चलते हुई थी शराफत की हत्या

प्रेेम पं्रसग के चलते हुई थी शराफत की हत्या
20 जनवरी से गुमशुदा युवक की हत्या के मामले में प्रेसवार्ता कर किया खुलासा
अमर नौरिया
राष्ट्रचंडिका/नरसिंहपुर-  कपूरी रेल्वे गेट के पास मिली एक लाश की शिनाख्त करेली तहसील के ग्राम रांकई निवासी एक युवक शराफत खान के रूप में की गई और पिछले माह 20 जनवरी से गुमशुदा हुये शराफत की इस तरह से लाश मिलने से पिछले कई दिनों से उनके परिजनों के पुलिस के अधिकारियों के पास आवेदन देकर जो आशंका जाहिर की जा रही थी की उनके बेटे के साथ किसी भी तरह की अनहोनी न हो इस बात की आशंका सच ही साबित हुई और उनका आक्रोश इस तरह से उपजा की उन्होनें मृतक की लाश को लेकर करेली थाने पहुंचकर इस मामले में करेली पुलिस के  ऊपर लापरवाही का आरोप भी लगाया ।
इस संबंध में पुलिस कंट्रोल रूम में आयोजित पत्रकार वार्ता के दौरान पुलिस अधिक्षक  मुकेश श्रीवास्तव ने बताया कि दिनांक 4 फरवरी को दोपहर कपूरी नहर की खंती में रेल्वे लाइन के किनारे नरसिंहपुर में अज्ञात व्यक्ति जो 30 से 35 वर्ष के शव मिलने की सूचना पर थाना कोतवाली नरसिहपुर में मर्ग क्रं 14/17 कायम किया गया मृतक के कपड़ो के आधार पर उसकी शिनाख्त करेली थाना के गुम इंसान कं्र.08/17 के गुमशुदा मोहम्मद शराफत पिता मोहम्मद कयूम मुसलमान उम्र 25 वर्ष रांकई थाना करेली के  नाम से की गई ।
घटनास्थल पर जो परिस्थियां पाई गई उस आधार पर पुलिस प्रथम दृष्टया इस नतीजे पर पहुंची  की किसी अज्ञात व्यक्ति  या व्यक्तियों के द्वारा शराफत की हत्या की गई है और इस मामले को लेकर थाना कोतवाली नरसिहपुर में अपराध क्रं 194/17 धारा 302,201 भादवि के अंतगर्त  प्रकरण पंजीबद्ध कर विवेचना में लिया गया ।
विवेचना के दौरान मृतक शराफत की मोबाइल नंबर की सीडीआर निकाली गई जिसके आधार किये गये विश£ेषण में यह पाया गया कि घटना दिनांक 20 जनवरी 2017 को मृतक शराफत के मोबाइल नंबर पर कुछ संदिग्ध नंबरों से बातचीत होने पर उक्त नंबरों की सीडीआर कैफ की जानकारी लेकर साइबर सेल की मदद से उक्त नंबरों के धारकों से पूछताछ की गयी जो कि आरोपी नरेश नौरिया पिता रमेश प्रसाद नोरिया निवासी पिपरिया थाना करेली द्वारा दिनांक 19/12/2016 को राष्ट्रीय राजमार्ग पर करेली के पास आरिफ एवं उसकी प्रेमिका से उनके दो मोबाइल लूटना बताया विवेचना मे आरोपी नरेश  नोरिया द्वारा उपरोक्त लूटे गये मोबाइल की काल डिटेल की आधार पर पाया गया कि नरेश नोरिया के द्वारा दिनांक 20/01/2017 को सायं करीब 7 बजे मृतक शराफत को फोन करके पार्टी के लिये बुलाया गया एवं उसी दिनांक को अपनी मोटर सायकल पर बैठाकर कपूरी रेल्वे फाटक के पास स्थित नहर के किनारे ले जाकर प्रेम  संबंधों को लेकर विवाद करते हुये शराफत के गले में चाकू मारकर गहरे नाले में गिराकर उसके सिर में पत्थर मारकर हत्या कर दी गई व इसके बाद घटना में प्रयुक्त चाकू एवं मोटर साइकिल को घटना के समय पहने कपड़ों को अपने घर में छिपा दिया एवं अपने मोबाइल को जो उसने दिनांक 19/12/2016 को करेली से लूटा था को घर में आग तापने वाले अंगीठी में डालकर जला दिया ।

पहले जवाब दे फिर दिखाये नाच गाना

जनता की अदालत में देंगे जवाब? या नाच गाना होगी औपचारिकता
पहले जवाब दे फिर दिखाये नाच गाना
राष्ट्रचंडिका/ सिवनी। देश जब आजाद नहीं हुआ था तब राजाओ का शासन था और हर व्यक्ति को शिक्षा सुलभता से नहीं मिल पाती थी तब राजा का कोई विरोध ना करे इसलिए राजा महाराजा अपने क्षेत्र की जनता के मनोरंजन के लिये नृतकी बुलवाकर उनका मनोरंजन किया करते थे लेकिन आजादी के बाद नृत्य को भले ही कला का नाम मिला हो मगर सभ्य समाज नृत्य को अच्छा नहीं मानता, हाल ही में सिवनी के विधायक लखनादौन की तरह सिवनी में भी लोगों को सुरा सुंदरी और नाच गाने के माध्यम से राजा महाराजाओ की तरह मनोरंजन करना चाहते हैं।
हम यहां उनसे एक प्रश्र पूछना चाहते हैं कि अगर दिनेश राय जनता की अदालत में प्रश्र की का जवाब देना चाहते हैं तो वे सर्वप्रथम अपने मनोरंजन के कार्यक्रम के पूर्व जनता के सवालों का जवाब के दे इसके बाद अपने उस आयोजन को करायें क्योंकि तीन वर्षो से जनता इंतेजार मे हैं कि दिनेश राय ने जो जनता से वायदे किये थे उन्हें पूरा क्यों नहीं किया। सिवनी में युवाओं को रोजगार के लिये क्यों उद्योग नहीं प्रारंभ किये गये, किसानों की समस्याआं के लिए किये गये आंदोलन से उन्होंने दूरी क्यों बनायी? सिवनी में विश्वविद्यालय खोले जाने एवं मेडिकल कॉलेज खोले जाने को लेकर उन्होंने क्या प्रयास किये। क्या विधानसभा के पटल पर प्रश्र रखने से उनका कर्तव्य पूरा हो जाता है।  विधायक दिनेश राय पर यह भी आरोप लगता है कि वे कभी कांग्रेस के पाले में तो कभी भाजपा के पाले में जाने की अफवाह उड़ाते रहे हैं और हकीकत क्या है वह भी स्पष्ट करें जिस जनता ने राष्ट्रीय पार्टी को दरकिनार कर उन्हें पूर्ण बहुमत से जिताया था उन भोले भाले लोगों की समस्याओं का समाधान के मामले में आपके प्रयास क्या रहे?  फोरलेन के मामले में आपके वायदे प्रयास क्या रहे हैं, शायद इसका जवाब आपके पास ना हो इसी तरह नगर पालिका भ्रष्टाचार के मामले में आपका मौन रहना आपकी छवि को धूमिल कर रहा है। अस्पताल में यूनियनबाजी के चलते शासन की योजनाओं से लोग वंचित हो रहे हैं।  क्या जनता की अदालत में दिनेश राय दे पायेंगे जवाब? या फिर नाच गाना कराकर इस कार्यक्रम की औपचारिकता 

ब्राम्हण समाज का बसंत पंचमी आयोजन...

ब्राम्हण समाज का  बसंत पंचमी आयोजन...
प्रज्ञानानंद जी की उपस्थिति में कौन ब्राम्हण आये
पल्लू कांड को भूला ब्राम्हण समाज
मजे की बात तो यह है कि जिस पल्लू कांड को ब्राम्हण समाज ने मुद्दा बनाया था और विधायक दिनेश राय मुनमुन के विरोध में सडक़ पर उतरकर धरना दिया था आज उसी पल्लू कांड को शायद ब्राम्हण समाज भूल चुका है या भुलाने की कोशिश कर रहा है। बीते दिनो बसंत पंचमी के मौके पर हुए विधायक के सम्मा



न को देखकर लोग यही कहते रहे कि ब्राम्हण समाज शायद पल्लू कांड को भूल चुका है। इस कांड के बाद मुनमुन की जमकर किरकिरी भी हुई थी लेकिन उन्होंने नीता पटेरिया को अपनी भाभी का दर्जा देते हुए लोगों को समझाने की कोशिश भी की थी। इतना ही नहीं विधायक श्री राय ने एक लंबी चौड़ी रैली निकालकर अपने ऊपर लगे आरोपो को झूठा बताया था। 

राष्ट्रचंडिका/सिवनी। परम आदरणीय पंडित जी और जिले के तथाकथित रूप से प्रौढ़ होने के बावजूद ‘युवा’ कहना पसंद करने वाले ठेकेदार (समाज के भी होने का दंभ) पं. अजय मिश्रा क्या कर रहे हैं ? सामाजिक और खासकर निजी सामाजिक जो कि एक समाज विशेष का रहा में किस राजनैतिक लाभ के तहत पर विजातीय व्यक्ति का ‘सामाजिक राजतिलक’ किया गया।
उल्लेखनीय होगा कि गत दिवस बसंत पंचमी के दिवस सर्व ब्राम्हण समाज के तत्वावधान में डूंडासिवनी में प्रस्तावित श्री परशुराम परिसर में एक सामाजिक आयोजन किया गया। इस सामाजिक उत्थान आंदोलन में समाज के 16 बटुको ने जीवन प्रयाण दीक्षा (जनेऊ) ली जो पूर्व के आयोजनों से कमतर आंका जा रहा है जहां पहले यह संख्या सैकड़ों में होती थी वह अब बमुश्किल दर्जन ही पार कर सकी।
राष्ट्रसंत के रूप में घोषित व परम विभूषित जगदगुरू स्वामी शंकराचार्य के चहेते शिष्य प्रज्ञानानंद जी (केवलारी वाले) के सानिध्य में यह कार्यक्रम संपन्न हुआ। इस तथाकथित कार्यक्रम में जिसमें समूचे दिवस भोज भी आयोजित था उसमें कहने को तो जिले के समस्त ब्लाकों के लोगों ने सहभागिता दर्शाई पर गौर करें तो इस आयोजन में जिला तो क्या शहर के एक बड़े तबके का ‘ओरिजनल ब्राम्हण समाज’ नदारद रहा। प्रौढ़ हो चले युवा ब्राम्हण समाज के अध्यक्ष और उनके प्रवक्ता को सोचना चाहिए? एक और यक्ष प्रश्र कि जब आप अपने आयोजन को सर्ववर्गीय ब्राम्हण समाज का होना बता रहे हैं तो फिर दुर्गा चौक और उसके आसपास दशकों से निवास कर स्थाई नागरिक बन युवा ‘राजस्थानी ब्राम्हण’ समाज इसका भागीदार क्यों ना बन सका?
यह बानगी है जिले के ब्राम्हण समाज के युवा अध्यक्ष पं. अजय मिश्रा की। उन्होंने अखबारों में विज्ञप्तियां जारी कर अपने अस्तित्व को जगा दिया पर इसके पीछे देखा जाये कि क्यों ‘राष्ट्रसंत’ अब भी इनके पीछे नजरे इनायत किये हुए है। विदित हो कि इसके पूर्व भी इन युवा अध्यक्ष की विशेष टोली जो जयपुर आश्रम गई थी कि कथित टोली ने वहां दर्शन के नाम पर एक होटल में रूककर सरेआम शराबखोरी की थी। होटल के उस कमरे में शराब की खाली बोतले और आपत्तिजनक चीजें पाई गई थी यह खुलासा होटल के बेयरे ने किया था।  राष्ट्रचंडिका ने पूर्व में भी इसका खुलासा किया था।
अब बात की जाये राष्ट्र संत के इस चहेते शिष्य की। क्या कारण है कि बार बार घोषणाएं होने के बावजूद समाज के प्रवक्ता जी अपने अध्यक्ष और कार्यकारिणी की सहमति नहीं ले पा रहे हैं उनके द्वारा हमेशा विज्ञप्तियों के माध्यम से कहा जा रहा है कि शीघ्र ही समाज की कार्यकारिणी के युगत होकर नवीन पदाधिकारी यर्थात किये जायेंगे पर ऐसा क्यों नहीं हो पा रहा है यह एक शोध का विषय है। क्या ऐसा तो नहीं कि वर्तमान ब्राम्हण समाज अध्यक्ष, उनके संरक्षक, प्रवक्ता और स्वामी जी किसी मानसिक रूप से प्रौढ़ युवा को संरक्षण तो नहीं दे रहे हैं।
इस समाचार के परिपेक्ष्य में यह बताना जरूरी है कि हम किसी व्यक्ति विशेष से दुर्भावना नहीं रख यह खुलासा कर रहे हैं हमें समाज के ही इनसे प्रताडि़त अनके बंधुओं ने इससे अवगत कराया है। ‘राष्ट्रचंडिका’ द्वारा इन प्रौढ़ हो चले तथाकथित जिला युवा ब्राम्हण समाज के स्वयंभू अध्यक्ष पं. अजय मिश्रा ठेकेदार के बारे में समाचार प्रकाशित किये गये। इससे तिलमिलाकर पंडित जी अनुविभागीय अधिकारी (एसडीएम) से शिकायत की गयी थी बल्कि उनके द्वारा अखबार के सर्वोच्च कार्यालय दिल्ली के आरएनआई में भी जोर आजमाईश की गई नतीजा जीरो निकला। इस बौखलाहट के बाद पंडित जी संपादक और उसके परिजनों पर गुंडई का दबाव डालने से भी नहीं चूक रहे हैं। देखना यह है कि इस खुलासे के बाद समाज के रहनुमा क्या कदम उठाते हैं। 

Monday, 16 January 2017

सालों से अपने गांव छोड़ परिवार के साथ कर रहा है गौवंशो की देखभाल  
साधु के कहने पर आज भी कर रहा है गौसेवा धर्म का पालन 
अमर नौरिया
राष्ट्रचंडिका/नरसिंहपुर। प्रदेश सरकार भले ही गौपालन सहित गौवंशो के संवर्धन के लिये अपनी ओर से किये जा रहे प्रयासों की बात करे किंतु किसी एक नर्मदापरिक्रमा वासी साधुसंत की बात को अपना  धर्म वाक्य  समझकर कोई व्यक्ति पिछले कई साल से बिना किसी सरकारी सहायता व सहयोग के कई दर्जनों गौवंशो का पालन पोषण सहित  देखभाल करे तो अपने आप में यह एक सच्ची गौसेवा है जो परेशानियों से जूझते हुये एक गरीब द्वारा की जा रही है । 
नरसिंहपुर जिला मुख्यालय से लगभग 55 किलोमीटर दूर  रीछई पंयायत के पास जंगल किनारे मृगन्नाथ धाम के पास लगभग 5 साल से उमरिया चिनकी निवासी नन्हेलाल यादव एक छोटी सी झोपड़ी के सहारे बेसहारा व अवारा घूमती गायों को लेकर उनकी देखभाल अपने परिवार सहित कर रहा है ।  गौसेवा के प्रति उसके इस सेवाभाव को लेकर हमने रीछई गांव जाकर उससे मुलाकात कर उसके द्वारा की जा रही गौसेवा करने का जो कार्य किया जा रहा था उसकी जानकारी ली तो उसने बताया कि वह उमरिया चिनकी गांव का रहने वाला है कुछ सालो ंपूर्व चिनकी के पास हथियाघाट पर एक परिक्रमावासी साधु आया था जिसको को किसी ने दो गाय दान दे दें थी उन गायों की सेवा करने के दौरान हाथियाघाट पर ही उसे 20-22 अन्य और दान में मिली व बेसहारा घूमती गायों की देखभाल करने की जिम्मेदारी उन साधु ने सौप दी थी । गायों की संख्या अधिक होने से उनक ी खाने पीने  में आने वाली परेशानी को ध्यान में रखते हुये साधु ने उन सभी गायों को लेकर जंगल से लगे क्षैत्र में उन गायों की देखभाल कर उनके खाने पीने का अच्छा इंतजाम हो सके इस हेतु रीछई गांव के पास मृगन्नाथधाम के पास एक जगह चुनी और वहां पर एक कुटिया व बाड़ा बनाकर वहां पर गौवंशों की देखभाव व उनके खाने पीने की व्यवस्था की जाने लगी इस सारे कार्य को करने के दौरान लगभग 3 साल पहले  साधु ने अपनी नर्मदापरिक्रमा की राह पकड़ ली तब से लेकर आज तक नन्हेलाल उक्त स्थान पर संसाधन जुटाकर व आसपास के लोगों से सहायता  प्राप्त कर दर्जनों गौवंशो की देखभाल कर रहा हे उसके इस काम में हाथ बंटाने के लिये उसका एक साथी जम्मन मेहरा जो कि समनापुर बरेला गांव का रहने वाला है वह भी उसका हाथ बटाता है ।  महत्वपूर्ण बात यह कि इस दौरान नन्हेलाल की पत्नि भी उसके साथ गौवंशो की सेवा में निस्वार्थ भाव से लगी रही जिसकी मृत्यु लगभग 2 साल पूर्व हो चुकी है । 
नन्हेलाल का एक लडक़ा है जिसका नाम सोनू है जो कि कद्वाा आठवीं तक पढ़ा है वह भी अपने पिता के साथ इन गौवंशो की देखभाल करता है । वर्तमान में इन लोगों के पास एक सैकड़ा के करीब गौवंंश है जिनको को सुबह होते ही जंगल में चारा आदि खाने के लिये छोड़ दिया जाता है इसके बाद शाम को उन्हें बनाये गये एक बाड़े में सुरक्षित कर दिया जाता हेै ।  इनके पास अधिकतर संख्या में गायों की ही संख्या ज्यादा है जिनमें से एक गाया मथुरा ने एक सुंदर बछड़े को  जन्म दिया है । 
इनके द्वारा इस तरह से गौवंशो की सेवा को लेकर गौशाला को खोलने के लिये भी प्रयास किये जा रहें हैं किंतु शासन व प्रशासन के पास अभी तक इनकी बात नहीं पहुंची अलबत्ता नमामि देवि नर्मदे ,नर्मदा सेवा यात्रा जब समनापुर गांव में रूकी थी तो नन्हेलाल के द्वारा प्रदेश के वनमंत्री गौरीशंकर शेजवार जी व गौसंवर्धन बार्ड के अध्यक्ष स्वामी अखिलेश्वारानंद जी महाराज जो कि इस यात्रा के दौरान समनापुर में थे उन्हें एक आवेदन देकर गौशााला खोलने हेतु शासन की ओर से सहयोग व मदद किये जाने की मांग की गई थी । 
 नन्हेलाल यादव व उसके साथी जम्मन मेहरा की आज के दौर में गौसेवा के प्रति लगन व उत्साह को देखते हुये हमें भी यह लगता हे कि बिना किसी भी तामझाम के इन ग्रामीणों ने गौसेवा को जो संकल्प लिया है अपने आप में वह एक मिसाल है । 

जंगल जुएं पर सब खामोश

जंगल जुएं पर सब खामोश


खुलेआम चल रहा जंगलों में जुआं
राष्ट्रचंडिका/सिवनी। कहते हैं सिवनी का जुआं पूरे महाकौशल क्षेत्र में फेमस है जहां हर प्रकार की व्यवस्था (शबाब और कबाब) फड़ में ही मौजूद रहती है। इसके लिए नालकट द्वारा अलग से कोई फीस नहीं ली जाती। सूत्रों की माने तो नरसिंहपुर, करेली, छिंदवाड़ा, मंडला, बालाघाट, कटनी सहित आसपास जिलों के जुआरीं दांव फेंकने सिवनी ही आते हैं। बेईमानी का यह धंधा बड़ी ईमानदारी से चलाया जाता है। जुएं खिलाने के मामले में पहले इक्का-दुक्का नाम ही चला करते थे लेकिन अब वक्त ने ऐसी करवट बदली कि जोकर भी बादशाह बन बैठा है। इसका जीता जागता उदाहरण घनश्याम नामक नलकट है। जो कुछ ही समय में अपना जुआं साम्राज्य जमाने में सफल हो गया। घनश्याम के हौंसलों की भी दाद देनी चाहिए जो खुलेआम कहता फिरता है कि मैं पुलिस को अपनी जेब में रखता हूं। ऐसे और भी नाम हैं जो जुआं खिलाने के मामले में फेमस हैं।
जुआं फड़ में ही फायनेंस सुविधा
जुआरियों के लिए इससे अच्छी बात और क्या होगी कि उन्हें जुआं फड़ (जहां जुआं खिलाया जाता है) वहीं फायनेंस की सुविधा मिल जाती है। इसके एवज में जुआं खेलने वालों को अपनी कोई चीज गिरवी रखनी होती है। पुराने खिलाडिय़ों को तो जुबान की कीमत के आधार पर रूपया फायनेंस हो जाता है लेकिन इसके एवज में एक दिन के दोगुने और दो दिन में चौगुनी राशि बढ़ते जाती है। ईमानदारी के इस धंधे ने कई परिवारों के चिराग बुझा दिये हैं। कई युवा तो जुएं के कर्ज से दबकर अपनी जान तक दे दी है तो कई युवा शहर छोडक़र ही लापता हो गये हैं।
 यहां चलता है जुआं
अगर हम सिवनी नगर की बात करें तो शहर के मंगलीपेठ, भैरोगंज, लूघरवाड़ा, भोमा रोड, पलारी रोड, जबलपुर रोड सहित सुनसान इलाको (जंगली क्षेत्रो) में बेधडक़ जुआं खिलाया जा रहा है। खैर यह तो नगरीय क्षेत्र की बात हो गई अगर पूरे जिले की बात की जाये तो ऐसा कोई क्षेत्र या विकासखंड नहीं है जहां जुआरियों का सिक्का न चलता हो। 
ऊपर तक जाती है नालकटो की चढ़ोत्तरी

जुआं फड़ में बैठने वाले एक युवक ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि नालकट जुआरियों को यह दिलासा देते हैं कि उनके फड़ में रेट पड़ ही नहीं सकती चूंकि हमारा पैसा पुलिस के आला अफसरान से लेकर बड़े-बड़े अधिकारियों तक जाता है। 
शराब और अश्लील डांस का मजा
सूत्रों की माने तो बड़े जुआं फड़ों में शराब से लेकर नृत्य बालाओं का अश्लील डांस भी देखने को मिलता है। इतना ही नहीं जुआं फड़ों में आने वाले नशेड़ी युवा तो नृतिकाओं से छेड़छाड़ भी कर देते हैं। बीते दिनों छपारा के जंगलों में भी एक ऐसा ही मामला सामने आया था जहां वाटर पु्रफ टेंट में जुआं चल रहा था जहां पुलिस ने दबिश दे दी उन्हें जुआरियों की चप्पल व वाहन के अलावा कुछ हाथ नहीं लगा।
पुलिस से तेज मुखबिरी
जुआरियों की मुखबिरी पुलिस से भी तेज होती है। यहीं कारण है कि जुआं फड़ों में कम ही गाज गिरती है। सूत्रों की माने तो थाने से लेकर जुआं फड़ों तक इनके टॉवर खड़े होते हैं जो पल-पल की जानकारी अपने आका को देते हैं। यदि कोई जुआं खिलाने की जानकारी थाने में देता हैं तो थाने में ही बैठे कुछ दलालनुमा पुलिसकर्मी नालकट को सावधान कर देते हैं।
वर्चस्व की लड़ाई में हो सकता है गैंगवार
कहते हैं जंगल में एक ही राजा होता है लेकिन जुआं फड़ों के इस जंगल में अब रोजाना ही राजा (नालकट) पैदा हो रहा है। अब नालकटों में भी वर्चस्व का जुनून समाया हुआ है। हर नालकट यह चाहता है कि जुआंरी उसके ही फड़ में जुआं खेलने आये। नालकटों के बीच वर्चस्व की लड़ाई किसी बड़े गैंगवार को दावत दे रही है। बीते दिनों भी एक नालकट ने एक युवक को इतना पीटा था कि उसे बेहोशी की हालत में अस्पताल ले जाया गया।
                                           आज प्रतिस्पर्धा इतनी बढ गई है कि कोई भी यह देखने को तैयार नहीं कि काम जो वो कर रहा है वह सहीं है या गलत। नगर में तो कई जुंए के अड्डे चल ही रहे हैं जहां चाह के बाद भी पुलिस को राह नजर नहीं आ रही है किंतु अचम्भे की बात यह है कि अब ग्रामीण क्षेत्रों में भी ताश की पत्ती का यह खेल खेत-खेत में खेला जाने लगा है और इतना व्यापक स्वरूप ले चुका है कि शहरी क्षेत्र के जुंआडी भी गांवो मंे जाकर अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार सिवनी अडोस पडोस के जिलों में इसलिये ख्यातिलब्ध हो चुका है कि यहां बडे-बडे दांव अंदर बाहर होते हैं। जिसके चलते बालाघाट, छिंदवाडा, मंडला, नरसिंगपुर तक से लोग यहां आ रहे हैं और कभी जीत तो कभी हार कर रहे हैं।  ऐसा भी माना जा रहा है कि ये सब पुलिस की जानकारी मंे तो है किंतु पुलिसया विभाग भी इन पर कोई  कार्यवाही करने से गुरेज रखता है अब उसका कारण जो भी हो पर इतना तो सभी को ज्ञात है कि इन जुंए के फड लगाने वालों ने कई घरों से चिराग अपने हाथो से बुझाए हैं और अगर शीघ्र कार्यवाही करके ये सब काले धंधे बंद नहीं कराए गये तो वह दिन दूर नहीं जब या तो हर दिन कर्जे मंे दबे जुंआरी आत्महत्या करंेगे या फिर जुंआ खिलाने के धंधे के चलते गैंगवार होगा। जिला पुलिस अधीक्षक को अपने विभाग की लगाम कसकर खींचने की अत्यंत आवश्यकता  आन पडी है।