Saturday, 25 February 2017

जनता की अदालत में आज भी सवाल

जनता की अदालत में आज भी सवाल
क्यों लगे सुरक्षा में 300 पुलिसकर्मी
क्या दे पाये जवाब विधायक?
क्यों नहीं किया सम्मान वंदेमातरम कलाकारों का
राष्ट्रचंडिका/सिवनी। ‘सिवनी की अदालत’ यह शब्द किसी फिल्म का टाइटल सा प्रतीत होता है वैसे तो अदालत का अर्थ उस न्याय की देवी से है जो आंख में सिर्फ इसलिए काली पट्टी बांधती है जिससे वह न्याय करते समय अपने नाते रिश्तों को दरकिनार करते हुए न्याय कर सके लेकिन हाल ही में सिवनी के विधायक दिनेश राय ने जनता की अदालत का आयोजन किया जिसमें उन्होंने अपनी सुरक्षा के लिए पुलिस प्रशासन से लेकर अपने लखनादौन एवं अन्य क्षेत्र से ऐसे लोग बुला रखे थे जो यहां फिल्मी हस्तियों से मनोरंजन एवं सुरक्षा कवच का रोल अदा करने के लिए थे।
इस आयोजन के पूर्व उन्होंने जनता से सवाल रखने की बात कही थी लेकिन जैसे जैसे कार्यक्रम तिथि नजदीक आती गयी श्री राय का विरोध  भाजपा-कांग्रेस में गति पकडऩे लगा तो उन्होंने अपनी सुरक्षा के लिये प्रशासन पर दबाव बनाकर पुलिस विभाग से 300 से अधिक कर्मचारी अपनी सुरक्षा में तैनात कराये तथा प्रश्र पूछने वालों को कार्यक्रम स्थल में ही नहीं पहुंचने दिया और जब वे लोग वहां नहीं पहुंचे तो अपने चाटुकारी से जनमत संग्रहित कराया अब आप ही बताये कि क्या यही जनता की अदालत है।
जनता की अदालत का नाम देकर अदालत जैसे न्यायप्रिय शब्द का अपमान करना कहां तक न्यायसंगत है। अदालत में न्यायाधीश होते पैरवी करने को अधिवक्ता होते हैं और फरियादी के रूप में पीडि़त होते हैं लेकिन इस अदालत में पीडि़त जनता की फरियाद सुने बिना ही फैसला सुना दिया गया भले ही यहां पर न्याय करने वालों ने पीडि़तों के साथ अन्याय किया हो लेकिन ऊपर वालों का न्याय के सामने किसी की नहीं चलती।
आयोजन में अपने भाषणों में श्री राय ने जिस तरह से भाजपा नेता पर प्रश्र उठाया पल्लू की घटना को कांड का नाम दिया तथा अनेक यक्ष प्रश्रों का उल्लेख किया जो इतना निम्र स्तर का उदाहरण था जिसे शब्दों में व्यक्त करना शब्दों का अपमान होगा। इस आयोजन को स्वस्थ्य मनोरंजन का नाम दिया गया था क्या वहां बैठी जनता कैबरे की पोशा में मुंबई की बालाओं का नाचना जैसे कार्यक्रम को स्वस्थ मनोरंजन का नाम दे सकेगी? क्या आयोजन में आये ऐसे कलाकार नही थे जो सुरापान कर मंच पर भोड़ापन दिखा रहे थे ? क्या यह स्वस्थ मनोरंजन है। वंदे मातरम कार्यक्रम इस कार्य आयोजन का प्रेरणा स्प्रद पहलू था लेकिन दुर्भाग्य है कि मुंबई के कलाकारों को तो मंच पर सम्मानित किया गया लेकिन वंदेमातरम में आये कलाकारों को आयोजन के दौरान श्री राय ने सम्मानित भी करना उचित नहीं समझा। शायद श्री राय की देशभक्ति सिर्फ आयोजन तक सीमित थी। आयोजन के नाम पर मीडिया गैलरी में ऐसे अनेक फर्जी पत्रकारों को तो बैठाया गया लेकिन वास्तविक पत्रकारों को व्यवस्थाओं के साथ जद्दोजहद तक करनी पड़ी और आवेश को देखते हुए अंत में श्री राय के मीडिया प्रभारी ने वहां से हटना ही उचित समझा।

गुप्त रूप से जो मीडियाकर्मी विरोध करने वाले थे उन्हें मौन रखने के तमाम इंतेजाम भी किये गये जो कार्यक्रम के उपरांत उजागर हुआ। अगर जनता की अदालत का यह स्वरूप रखना है तो भविवष्य में ऐसे आयोजनों पर विराम लगाना ही ज्यादा उचित होगा शायद इस आयोजन के माध्यम से विधायक श्री राय अपने आपको राजा हरिशचंद बताना चाहते हैं अब सवाल यह है कि क्या राजा हरिशचंद बनना या जनता को उनके प्रति जनता की अदालत के परिणाम क्या देगी यह चिंतन का विषय है लेकिन रंग बिरंगे कार्यक्रम मनोरंजन तो कर सकते हैं मगर जनता आज भी उस घोषणा पत्र को अपने पास रखी है और जवाब मांग रही है कि क्या वास्तव में श्री राय ने अपना वायदा निभाया? 

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