Saturday, 17 June 2017

परिषद को के.के. से अच्छा नहीं मिला प्रभारी

परिषद को के.के. से अच्छा नहीं मिला प्रभारी

स्वार्थसिद्धि के लिए दे दिया पद

जीवन के सर्वागीा विकास के लिए शिक्षा को सर्वोपरि माना गया है और ऐसा माना जाता है कि जीवन में जो अच्छी तरह शिक्षा ग्रहण करता है उसे समाजसेवा का मौका देती है लेकिन कुछ स्वार्थी तत्व अपने आप को शिक्षाविद कहते हैं और शिक्षा के नाम पर मासूमो के भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं क्या यह समाज ऐसे लोगों को माफ करेगा।

राष्ट्रचंडिका/ सिवनी। डीपी चतुर्वेदी महाविद्यालय के संचालक के.के. चतुर्वेदी का नाम किसी से छिपा नहीं है हर माह विश्वविद्यालय इन्हें किसी ना किसी अवार्ड से सम्मानित करती है ये अवार्ड ऐसे हो गये है जैसे घर में होने वाली कथा के बाद प्रसाद दिया जाता है ठीक वैसे ही यूनिवर्सिटी इन्हें अवार्ड देती है बेहतर होता बीते वर्ष की घटना पर भी लोग इन्हें एक अवार्ड या मेडल देते तो बेहतर होता।
हाल ही में भाजपा की विंग कही जाने वाली अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद जिसे अनुशासन आदर्श के नाम से जाता जाता है इस परिषद के राहुल पाण्डे एवं पियुष दुबे ने अपने थोड़े से लाभ के लिए ऊपर के मंत्रियो से कहकर केके चतुर्वेदी को तीन जिलो का प्रभारी बना दिया है इसके पीछे क्या कारण है यह जनचर्चा का विषय बना हुआ है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार राहुल पाण्डे एवं पियुष दुबे द्वारा केके चतुर्वेदी से इस शर्त पर यह दायित्व दिलवाने का मौखिक अनुबंध किया कि अगर वे अपने कॉलेज से उन्हें एमएसडब्ल्यू नि:शुल्क करवा देंगे तो वह इसके एवज में उन्हें परिषद का तीन जिलों का प्रभारी बनवा देंगे। जानकारों  का कहना है कि एमएसडब्लू जैसा महंगा कोर्स करने में 50-50 हजार रूपए की राशि खर्च करनी पड़ती है लेकिन इन दोनों ने फुकट का चंदन घिस मेरे लल्लू की कहावत को चरितार्थ किया है।
हम याद दिलाना चाहते है कि बीते वर्ष जो घटना इस डीपी चतुर्वेदी महाविद्यालय में घटी थी और जिसके सूत्रधार स्वयं के.के. चतुर्वेदी को माना गया था अभी उक्त मामले का अंतिम फैसला न्यायालय को में प्रतिक्षित है इसके बावजूद भी परिषद के वरिष्ठ पदाधिकारियों को जिले में कोई ऐसा नाम नहीं मिला जो परिषद की गरिमा को बढ़ा सकता। अगर यही स्थिति रही तो आने वाले समय में लोग अन्य संगठनों की तरह इस संगठन को भी गलत निगाह से देखेंगे।
बीते वर्ष घटित घटना के संदर्भ में राष्ट्रीय छात्र संगठन एनएसयूआई ने तो केके चतुर्वेदी का खुलकर विरोध किया था लेकिन एबीवीपी ने तो अपना मौन तक नहीं तोड़ा था इसके पीछे एक ही कारण माना जा रहा है कि चतुर्वेदी ने परिषद को अच्छा खासा सहयोग देकर उनके मुंह पर पट्टी बांध दी थी जिससे सदस्य उनके खिलाफ ना बोले जहां छोटी छोटी बातों को लेकर परिषद आये दिन सड़कों पर नारेबाजी करती है लेकिन उस घटना पर मौन रहना इस बात का सकेत है कहीं ना कहीं कुछ गड़बड है।
जो व्यक्ति घर परिवार के बीच अपनी मर्यादा को लांघ सकता है उससे समाज क्या अपेक्षा करेगा बेहतर होगा की परिषद ऐसे लोपियुष-राहुल की राजनीति का शिकार हुआ युवा छात्र
पियुष एवं राहुल की गंदी राजनीति का शिकार एक सक्रिय युवक भी हुआ जिसे जिला संयोजक का पद दिया जाने वाला था लेकिन इन दोनों ने ही उक्त सक्रिय छात्र का पत्ता कट करते हुए अपने आका का फोन कर किसी और को यह पद दिलवा दिया जबकि उक्त युवक का नाम फायनल ही माना जा रहा था लेकिन इनकी गंदी राजनीति ने छात्र को अपना शिकार बना लिया। गों को शामिल करने से पहले अच्छी तरह से विचार करें।

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