विवेक के दाता गणेश की बने रहे गरिमा
चंदा वसूल कर शौक पूरा करते हैं कमेटी के लोग
बाध्ययंत्र से आमजन होते हैं परेशान
राष्ट्रचंडिका/भगवान गणेश को बुद्धि एवं विवेक के दाता के रूप में पूजा जाता है लेकिन दस दिनों तक मनाये जाने वाले इस पर्व के दौरान गणोशोत्सव मनाने वाले लोग विवेक का जरा भी ध्यान नहीं रखते जिसके कारण बिना विवेक से की जाने वाली पूजा का प्रतिफल हमें अनेक रूप से देखने को मिलता है।
अक्सर देखा जाता है कि गली चौराहों में गणेश प्रतिमा स्थापित करने वाले मण्डपों में समिति के सदस्यगण मदिरापान करते हैं और अपने क्षेत्र में अशांति का वातावरण निर्मित करते हैं और जब पुलिस शाांति बनाने पहुंचती हे तो ये शांति के बाधक बन जाते हैं। क्या इस तरह गणोशोत्सव पर्व मनाना उचित है।
इस उत्सव को मनाने वाले लोग अक्सर मण्डपों में अनलिमिट साउंड में बाध्ययंत्रों को बजाकर बुजुर्गो एवं घरों में बीमार लोगों के लिये सिरदर्द बन जाते हैं जब इन समितियों से इन बाध्ययंत्रों पर कम साउंड या बंद करने की बात कही जाती है तो ये लोग अपना अपमान समझते हैं वे भूल जाते हैं कि उनके तेज बाध्ययंत्र बजाने से आपके एवं अन्य परिवार के लोगों को भी तकलीफ होती है।
गणेशोत्सव पर्व वैसे तो आजादी के पहले से मनाया जा रहा है और इस त्यौहार ने लोगों को एकजुट होने में काफी मदद भी की थी लेकिन उस समय के हालात और आज के हालातों में अंतर आ गया है। पहले शास्त्र सम्मत रीति रिवाज से इस त्यौहार को मनाया जाता था लेकिन वर्तमान में गणेशोत्सव मनाने वाले ना तो शास्त्र सम्मत तरीके से समय पर प्रतिमा को स्थापित करते हैं और ना ही समय पर विसर्जन करते हैं जिससे ऐसा प्रतीत होता है कि आयोजक इस उत्सव की आड़ में हमारे इष्टदेवता का माखौल उड़ा रहे हैं और विसर्जन यात्रा के दौरान शोभायात्रा में शराब का सेवन कर पुरानी रंजिश भुनाना और शांति भंग करने की घटनाएं आम हो गयी है इसके लिये पुलिस प्रशासन की सक्रियता हमें त्यौहार की गरिमा बनाने में मदद कर सकती है। सबसे गंभीर बात यह है कि इस उत्सव की आड़ में लोगों से अनाप शनाप चंदा वसूल करना आज का फैशन बन गया है और इस चंदे को मदिरा पान में खर्च करना भी फैशन बन गया है जिसको लेकर आमजनों को सक्रिय होने की जरूरत है वे चंदा देने से पहले जान ले कि जिसे आप उत्सव के नाम पर सहयोग कर रहे हें वास्तव में आपकी दी हुई दान की राशि का उपयोग उत्सव में हो रहा है या अन्य में।
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