Thursday, 23 July 2020

माझी समाज में सुनाई देने लगे हैं राजनीतिक दलों के खिलाफ विरोध के स्वर  



राष्ट्र चंडिका (अमर नोरिया) प्रदेश में होने वाले विधानसभा के उपचुनाव को लेकर बीजेपी और कांग्रेस के खिलाफ प्रदेश के माझियों में विरोध के स्वर सुनाई देने लगे हैं उसकी वजह यह कि लाखों की संख्या में प्रदेश में निवास करने वाले माझी समाज के ढीमर,कहार, केवट,मल्लाह, कश्यप,भोई,बाथम,रैकवार सोंधिया सहित अन्य अपने अनुसूचित जनजाति के संवैधानिक हक और अधिकार की मांग को लेकर 1992 से लगातार आवाज उठा रहे हैं  । माझी समाज को उसके हक और अधिकारों को लेकर प्रदेश के राजनीतिक दलों ने हर चुनावों के पहले इतने सब्जबाग दिखाये हैं किंतु जब उनपर कार्यवाही किये जाने की बात आई तो वह सब बातें केवल एक दिवास्वप्न  बनकर रह गई   देश के संविधान में  1950,1956 में मिली माझी जनजाति की श्रेणी की सुविधा का लाभ प्रदेश के माझी निषाद लोगों को नहीं मिल रहा है इसके लिये समाज के अनेक संगठनों सहित अनेक वरिष्ठ समाजसेवियों के द्वारा सड़कों से लेकर न्यायालयों तक अपनी मांग दोहराई जाती रही है । इतना सब कुछ करने और लगभग 3 दशकों से माझी जनजाति आरक्षण की मांग करते हुए समाज आज भी उसी जोश और जुनून से अपने हक और अधिकार की बात उठा रहा है,  मध्यप्रदेश में कांग्रेस और बीजेपी ने माझियों के इस मांग के अभियान को दिग्भ्रमित करने हेतु अपने अपने दलों में मछुआरों के नाम पर प्रकोष्ठ का गठन कर उनकी समस्याओं को निराकरण करने का लॉलीपॉप भी दिया है किन्तु राजनीतिक दलों के इन प्रकोष्ठ के माध्यम से वर्षों से चली आ रही माझी आरक्षण की मांग को लेकर कोई कार्ययोजना बीजेपी कांग्रेस के पास आज भी नहीं है । प्रदेश के कुछ जिलों में माझी निषाद समाज के लोगों को 1950 से मिली जनजाति की सुविधा के नाम पर कुछ प्रमाणपत्र ही जारी हुए हैं, किन्तु अधिकतर लोग आज भी संवैधानिक अधिकार से वंचित हैं । प्रदेश में जिस भी दल की सरकार रही उसके मुख्यमंत्री ने माझियों को आरक्षण दिये जाने को लेकर सार्वजनिक मंचों से घोषणाएं भी की गई किन्तु उनके द्वारा इस सम्बंध में आदेशों को निकाले जाने का इंतजार आज भी किया जा रहा है , वर्ष 2003 में राज्य मंत्री परिषद में एक प्रस्ताव के माध्यम से माझी की उपजातियों को पिछड़े वर्ग की सूची के क्रमांक 12 से विलोपित करने के प्रस्ताव पर सहमति बन गई थी किन्तु उसके बाद आज 17 साल बीत जाने के पश्चात उस प्रस्ताव पर भी कोई कार्यवाही नहीं हुई । महत्वपूर्ण बात यह भी है कि प्रदेश में अन्य जातियों के मामले में उनकी उपजातियों को विलोपित कर उन्हें अनुसूचित जाति वर्ग में शामिल कर लिया गया है किंतु मध्यप्रदेश में पिछड़ा वर्ग की सूची में क्रमांक 12 पर दर्ज ढीमर,कहार, केवट,भोई,मल्लाह,निषाद आदि के विलोपन किये जाने को लेकर मध्यप्रदेश की बीजेपी सरकार की पिछड़ा वर्ग अल्पसंख्यक कल्याण विभाग की तत्कालीन राज्यमंत्री स्वतंत्र प्रभार भी नोटशीट लिख चुकी हैं किंतु उसके बावजूद भी पिछड़े वर्ग की सूची से माझी की उपजातियों को विलोपित नहीं किया जा रहा है ऐसे में लगता है कि बीजेपी सरकार की मंशा यह है कि वह केवल अपने लोक लुभावन वादों और घोषणा करके प्रदेश के माझियों की वोट लेती रहे बाकी उन्हें जो आरक्षण का लाभ है वह कब मिलेगा इसकी कोई तिथि तय नहीं है और इसी बात को लेकर मध्यप्रदेश में होने वाले उपचुनाव में माझी समाज में सरकार की नीतियों को लेकर विरोध के स्वर मुखर होने लगे हैं ।

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