Saturday, 10 December 2016

                                                                                                 प्रेस की आड़ में धौंस
ाष्ट्रचंडिका/ यदि देश भर में यह सर्वेक्षण किया जाए कि दो चक्कों और चार चक्कों वाली गाडिय़ों पर सबसे अधिक कौन सा स्टीकर चिपकाया गया होता है? मेरा विश्वास है कि सबसे आगे ‘प्रेस’ ही होगा। गांवों, कस्बो, शहर और महानगर तक में आपकों बड़ी छोटी गाडिय़ों पर प्रेस लिखी गाडिय़ां आसानी से मिल  जाएंगी। कुछ लोग अपनी गाड़ी पर प्रेस लिखवाने के लिए और प्रेस लिखा परिचय पत्र पाने के लिए पैसा खर्च करने को भी तैयार होते हैं। मैंने सुना था, दिल्ली के गुरु तेग बहादुर नगर में कोई संस्था पांच सौ-हजार रुपए लेकर छह महीने-साल भर के लिए प्रेस परिचय पत्र जारी करती थी। यदि महीने में उसने पच्चीस-तीस लोगों का परिचय पत्र भी बनाया तो उसके महीने की आमदनी हो गई पन्द्रह से तीस हजार रुपए की। खैर, यहां मेरा उद्देश्य उनकी आमदनी पर बात करना नहीं है। मैं सिर्फ इतना समझना चाहता हूं कि अपनी गाड़ी पर प्रेस लिखने की ऐसी कौन सी अनिवार्यता है, जो प्रेस लिखे बिना पूरी नहीं होती।
क्यों किसी गाड़ी पर ‘प्रेस’ लिखा होना चाहिए? क्या आज किसी गाड़ी पर आपने पलम्बर, हेयर डिजायनर, एक्टर, सिंगर लिखा देखा है? सिर्फ प्रेस और पुलिस जैसे कुछ पेशे वाले ही अपनी गाड़ी पर अपना परिचय लिखवाते हैं। कुछ सालों से विधायक, सांसद, जिला पार्षद लिखने की परंपरा भी शुरु हुई है। क्या यह स्टीकर सिर्फ रोड़ पर मौजूद दूसरे लोगों पर धौंस जमाने के लिए होता है। या इसकी दूसरी भी कोई उपयोगिता है। किसी गाड़ी पर एम्बुलेन्स लिखा हो तो समझ में आता है। चूंकि एम्बुलेन्स के साथ कई लोगों की जिन्दगी और मौत जुड़ी होती है। यह मामला फायर ब्रिगेड की गाडिय़ों के साथ भी जुड़ा है।
वैसे कुछ पत्रकार मित्र यह भी कहेंगे कि रिपोर्टिंग के लिए जाते समय वे किसीवास्तव में प्रेस के स्टीकर के साथ यह अनिवार्य किया जाना चाहिए कि व्यक्ति उस संस्था का नाम भी साथ में जरुर लिखे, जहां से वह ताल्लुक रखता है। या फिर इस तरह के नियम बनने चाहिए कि प्रेस लिखा स्टीकर अपने पत्रकारों के लिए संस्थान ही जारी करें। इससे सडक़ पर प्रेस स्टीकर की अराजकता कम होगी। इसी प्रकार अपने व्यक्तिगत इस्तेमाल के लिए खरीदी गई गाड़ी पर कोई व्यक्ति पुलिस का स्टीकर लगा रहा है? तो यह समझने की बात है कि इसके पीछे उसका क्या उद्देश्य हो सकता है? इस तरह की स्टीकर बाजी पर वास्तव में कुछ नीति बननी चाहिए।  सिवनी से प्रकाशित होने वाले ऐसे कई अखबारों के रिपोर्टरों की यहां भरमार है जो उन अखबारों के नाम पर अवैध वसूली करते घूमते हैं। मजे की बात यह है ?कि सिवनी  के अखबार का रिपोर्टर होने का एक रौब रहता है और राजधानी के उन तथाकथित अखबारों की स्थिति भी वैसी ही है जैसे यहां पर उनके फर्जी रिपोर्टरों की। ये तथाकथित अखबार यहां अपने पत्रकार के रूप में वसूली एजेन्ट बना देते हैं जोकि भोले-भाले लोगों को प्रेस का रौब दिखाकर थाने, कचहरी की दलाली और अपराधियों को संरक्षण देने में लगे हुए हैं कुछ तो ऐसे हैं कि वे स्वयं ही यही धंधा कर रहे हैं। इस तरह के लोग पुलिस की भी आय का अच्छा जरिया बने हुए हैं। सिवनी  में अब यह भी होने लगा है कि प्रेस के कार्ड बनाकर एक-एक हजार रुपये में बेचे जा रहे हैं जिन्हें कोई भी ले सकता है चाहे वे पत्रकार हो या नही हो। ये लोग जिला, शहर, कस्बा आदि का सम्वाददाता कार्ड मुहैया कराते हैं और उनको गाडिय़ों या अन्य वाहन पर प्रेस लिखने का मौका देते हैं। बरेली में कुछ तथाकथित पत्रकार संगठन भी पैदा हो गए हैं जिनमें इस तरह के लोगों को अपना सदस्य बनाने और इस प्रकार प्रशासन के सामने शक्ति-प्रदर्शन की होड़ रहती है।

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