चिट्ठी कहो या पाती सुख-दुख की है साथी
(ललित निबंध)
समय साक्षी है, चिट्ठियों ने इतिहास में अमिट चिहिन्न अंकित किये हैं, जिनके निशान कभी तो भाव सौन्दर्य की मिसाल बन सामने आते हैं; तो कभी दुःख के तिमिर को अभिव्यक्त करते हैं| आज जब मानव, जीवन के नए पद सोपान चढ़ रहा है ऐसे में पत्र के महत्त्व के लिए गीत गागर पत्रिका के संपादक दिनेश प्रभात बड़ीसुंदर बात कहते हैं, “पत्रों में सुगंध होती है|” सच! आज भी जब कभी किसी का पत्र आता है तो मन प्रफुल्लित हो उठता है| चिट्ठी सुख-दुख बाँटने का सशक्त माध्यम है| प्राचीन काल से वर्तमान तक इसकी उपयोगिता अवर्णनीय है| यह माध्यम है संवादों का; सूचना का; व्यापार-वाणिज्य का; समाचार जगत का; कुछ खोने, कुछ पाने की खबर का; मित्रता बंध और विखंडन का; ख़ुशी और ग़म का; निंदाशास्त्र का; कभी ग़लत फ़हमियों तो कभी ख़ुश फ़हमियों का; अभिव्यक्ति है नौ रसों के नौ भावों का; कभी रूप है प्रेरणा का तो कभी निराशा का; मानव का मानव-से मानवीय और अमानवीय व्यवहारों का; यह स्रोत है हमारे जीवन में सूचनाओं के संप्रेषण का| सच ही तो है- “चिट्ठी की अपनी भाषा अपनी ज़ुबान होती है क्यों कि हर चट्ठी कुछ कहती है|” साधारण काग़ज़ पर लिखी चार पंक्तियाँ राजा को रंक और रंक को राजा बना सकती है| यह तो तय है कि सामर्थ्य का पिटारा है यह चिट्ठी| तभी तो भारतीय फ़िल्मो के कई गाने चिठी-ख़त पर आधारित हैं।
कभी आपके साथ भी हुआ होगा ऐसा कि अचानक किसी दिन आपको मिले अपनी अलमारी-से, ऊपर कमरे में राखी मेज़ की दराज़-से, बिल इत्यादी काग़ज़ फ़साने वाले तार-से कुछ पुरानी चिट्ठियाँ| दोस्तों की, माता-पिता की, परिजनों की, नौकरी संबन्धित, किसी पत्रिका की सदस्यता समाप्ती की सूचना, कुछ आमंत्रण, कुछ निमंत्रण, नए कोर्स सम्बन्धित जानकारी और आप खो जाओ उसी समय में जब वो वर्तमान थीं| महसूस किया होगा भावों की वही लहर जो तब उठी होगी| कहिये इस समय आपका अतीत आपके वर्त्तमान के साथ नहीं मिल जाता! पता है मुझे, ऐसा हुआ है, आखिर हमारा जीवन लगभग एक सा ही तो है| क्या विचार है आपका, हैं न ये चिट्ठियाँ स्मृतियों के स्मृति-गुच्छ! संदेशों का आदान-प्रदान मानव का आदि स्वभाव है जो आज तक यथावत है| नगाड़े, क़बूतर, बाज़, हँस, ये प्राचीन संदेश वाहक रहे हैं| लघु दूरी पर संदेश प्रेषण के लिए शस्त्र धारी, बाणों में पत्र फँसा कर गंतव्य पर लक्ष्य करते| लंबी दूरी के संदेश, वाचिक, लिखित अथवा सांकेतिक रूप में मानव संदेश वाहकों द्वारा पंहुचाय जाते| इसी अनुक्रम में मेरा विचार है महर्षी नारद और श्री हनुमान ऐसे संदेश वाहक थे जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय संदेश संप्रेषण को संभव बनाया| हनुमान द्वारा श्रीराम का वाचिक और मुद्रिका रूप में सांकेतिक संदेश, माता सीता तक पंहुचाया गया; जिसका उत्तर सीता ने चूड़ामणी भेज कर दिया| इसी के साथ उन्होंने एक विद्वान् राजनयिक का दयित्व भी ख़ूब निभाया और परिस्थितिजन्य हो लंका दहन कर त्वरित यौद्धिक कार्यवाही को अंजाम दिया, जिसे आज की सर्जिकल स्ट्राइक कहा जा सकता है| सीता हरण से आकुल राम ने वन-वल्लरियों और वन्य-जीवों से हाल(संदेशा) जानना चाहा- ‘हे खग-मृग हो मधुकर श्रेनी, तुम्ह देखी सीता मृगनैनी|” इसी प्रकार नारद जी द्वारा तीनों लोकों में भ्रमण की बात कही जाती है| द्वापर में श्री कृष्ण पांडवो का संदेश ले स्वयं हस्तिनापुर गए थे| इससे पता चलता है संदेश वाहक कितना महत्वपूर्ण पद था, जिसका वध निषेध था|
कथाएँ बताती हैं, हँस के संदेश से ही रजा नल और दमयंती का मिलन संभव हुआ| अपनी भूली भार्या शकुंतला को मुद्रिका-से ही रजा दुष्यंत पहचानते हैं| हुमायूँ रानी कर्णावती द्वारा रक्षाबंधन के साथ भेजे पत्र के परिणामस्वरूप उनकी सहायतार्थ आया | शिवाजी महाराज ने प्रशासनिक सुधारों के लिए अनेक प्रशासनिक आदेशों को संप्रेषित करवाया| अशोक ने सतम्भ लेखों के माध्यम से राजकीय आदेश आम किए, रानी दुर्गावती ने अकबर को पत्र के साथ सूत कातने का करघा भिजवाया था कि तुम आब बूढ़े हो गए हो घर पर सूत कातो| सांसारिक प्रताड़ना से दुखी मीरा बाई ने पदों में तुलसी को पत्र लिखा, जिसका उत्तर तुलसी ने भी पदों में ही दिया| आदीवासी समुदाय में पत्र के साथ क्या चीज़ रख कर भेजी जा रही है इसका बड़ा महत्त्व रहा; जैसे- पत्र के साथ लाल मिर्च और कँवल का फूल भेजने का आशय युद्ध संकेत था| भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में भी ऐसे ही रोटी और कंवल को विद्रोह-चिहिंन बनाया था। बाल-वधु मारू ने यौवन काल आने पर अपना संदेश तोते के माध्यम से अपने प्रियतम ढोला को भिजवाया| स्मरण करिए अनेक स्थानों पर प्राकृतिक उपादानों को संदेश वाहक के रूप में खुले ह्रदय-से अपनाया गया है; जैसे- मेघदूत में कालीदास ने मेघों के माध्यम से संदेश संप्रेषण संभव बनाया| इन सब अतीत की घटनाओं के स्मरण का ध्रुव-लक्ष्य यह सिद्ध करना है कि, चिट्ठी अतीत के व्यतीत को वर्तमान में ज़िन्दा रखते हुए भविष्य में यादों का पिटारा बनाने का एक सुंदर और सशक्त साधन है|
महरुन्निसा परवेज़ अपने संस्मरण ‘चिट्ठी में बंद यादें’ में लिखती हैं,”नए संचार के माध्यमों की जलकुम्भी में सहज संदेशों के मनोहारी कँवल क्या गुम हो जाएंगे यह समय ही बताएगा|” आज कई विद्वानों के ख़त हमारे लिए मार्गदर्शक हैं; जैसे- नेहरू जी द्वारा अपनी बेटी इंदिरा को लिखे पत्र ‘पिता के पत्र पुत्री के नाम’, घनश्याम दास जी बिड़ला द्वारा अपने पुत्र बसंत कुमार जी बिड़ला को लिखा पत्र, अब्राहम लिंकन का पत्र उनके पुत्र के शिक्षक के नाम, स्वतंत्रोत्तर भारतीय सामाजिक दशा का कटु चित्रण करता दरभंगा जेल से महात्मा गाँधी को लिखा, नारायण सिंह का पत्र, स्वामी विवेकानंद के पत्र, नाथूराम गोडसे द्वारा लिखा आत्मस्वीकृति एवं मृत्यु-पत्र इत्यादी अनेक ऐसे पत्र हैं जो स्वयं में एक अद्भुत दस्तावेज़ हैं| साहित्यिक गवाक्ष-से चिट्ठी-पत्री के संसार में झाँका जाए तो महान रचनाकारों की तत्कालीन चिट्ठियाँ कालांतर में कई पत्रिकाओं की शोभा बनी, जिनसे सीख ले कई और साहित्य सेवियों ने इस साहित्यिक जगत में कदम रखा|
स्वयंभू प्रश्न सामने आता है, आख़िर ये चिट्ठी, पत्री, पाती, ख़त, पुर्जी, है क्या...? मित्रों! ये किसी काग़ज़, कपडे, गत्ते, पत्ते का छोटा सा तुकड़ा है जिसमें कुछ सामाजिक, व्यक्तिगत, व्यापारिक, राजनैतिक, शैक्षणिक अथवा सार्वजनिक संदेश, संकेत, निर्देश, आदेश इत्यादी लिखे, उकरे, छपे अथवा अंकित रहते हैं| डाक विभाग द्वारा अन्तर्देशी, पोस्टकार्ड, लिफ़ाफ़े, टेलीग्राम, रजिस्टर्ड डाक, स्पीड-पोस्ट, पार्सल इत्यादी रूप में पत्राचार को सुगम बनाने की व्यवस्था की गयी है| संचार क्रांती के बाद सोशल मीडिया ने संदेश संप्रेषण को बहुत सुगम और गतिशील बना दिया, जिसमे ईमेल, जीमेल, फ़ेसबुक, व्हाटसैप, इस्न्टाग्राम, ट्विटर, टिकटोक इत्यादी व्यव्स्थाएं उपलब्ध हैं| यह विज्ञान का कमाल है, पर एक बात विशेष ध्यान देने की है कि, इतनी उन्नती के बाद भी हम हस्त लिखित दस्तावेज़ों को विशेष महत्त्व देते हैं| यहाँ तक की धार्मिक भावनाएँ भी इससे अछूती नहीं हैं | जबलपुर के नर्मदा तट ग्वारीघाट के समीप स्थित श्रीराम लला मंदिर में विराजे श्री हनुमान जी को लोग अपनी-अपनी मन्नतें लिखवाते हैं इसी लिए इन्हें अर्जी वाले हनुमान जी कहा जाता है| इन सब से ज़ाहिर है, पत्र-आचार किसी न किसी रूप में हमारे चहों ओर आच्छादित है|
चिट्ठी का यह माया जाल कई प्रकार का होता है; मसलन- विषयानुरूप, निमंत्रण-पत्र, आमंत्रण-पत्र, संवेदना-पत्र, शोक-पत्र, सामान्य पत्र इत्यादि तथा शैली-शिल्प के आधार पर औपचारिक पत्र, जिसमें प्रमुखतः कार्यालयीन एवं व्यापारिक-पत्र आते हैं| अनौपचारिक पत्रों के अन्तर्गत वे सभी पत्र आते हैं जो औपचारिक नहीं हेते| पत्र चाहे कोई भी हो उसका भषा-शिल्प आकर्षक, सरल, स्पष्ट, मौलिक, संक्षिप्त, स्पष्ट उद्देश्य और विराम चिहिन्नों से परिपूर्ण होना चाहिए ये पत्रीय सौन्दर्य को सुनिश्चित करते हैं| इस बात का भी विशेष ध्यान रखना चाहिए कि पत्र भेजने वाले और पाने वाले का पूर्ण नाम और पता उल्लेखित हो|
अपनी अक्षर-वाणी विराम के पूर्व यही कहूँगा, अतीत को वर्तमान और भविष्य से जोड़ने वाली चिट्ठी किसी न किसी संदेश को अवश्य वहन करती है इसीलिए सबका अपना-अपना मूल्य है| प्रगतिशील वसुधा में कवि बलराम गुमाश्ता की पंक्तियाँ कितनी सटीक हैं-
“माँ गाँव में मरी,
जिसकी सूचना मुझे भोपाल में तीन दिन बाद मिली|
इस तरह मरने के बाद भी,
मेरे लिए तीन दिन और ज़िंदा रही माँ|
मैं माँ की मौत पर नहीं सूचना पर रोया|”
भाव पूर्ति के लिए मैं स्वरचित पंक्तियों को पाठक न्यायलय के समक्ष प्रस्तुत करता हूँ-
“चिट्ठी आशय है काग़ज़ का,
बसता जिसमे संदेश कोई|
वो मनोभाव की पाती है,
सुख-दुःख का संदेश कोई|
वो कल की बिसरी यादें हैं,
वर्तमान का संदेश कोई|
वो यादों का गुलदस्ता है,
खट्टा-मीठा संदश कोई|
हर कपड़ा, पत्ता भी चिट्ठी है,
जिसमें लिखा संदेश कोई|”
तो चलिए मित्रों! संदेश क्रांती में आए डायनामिक परिवर्तन को स्वीकारते हुए भारतीय डाक सेवा से भी जुड़े रहें और उसके द्वारा समय-समय पर चिट्ठी लेखन को प्रोत्साहित करने वाले कार्यक्रमों का न केवल प्रतियोगी रूप में हिस्सा बने, बल्की चिट्ठी को अपने जीवन में पुनः स्थान दें| तो बस अब उठाइए क़लम और झट लिख भेजिए एक प्यारी-सी चिट्ठी अपनों को कि बनी रहे महक़ और खिला रहे यह पत्रों का गुलदस्ता हमेशा-हमेशा के लिए| विश्वास करिए बड़ा अच्छा लगेगा|
वंदे...!
अखिलेश सिंह श्रीवास्तव 'दादू'
कथेतर लेखक,
दादू मोहल्ला- दादू साहब का बड़ा,
संजय वार्ड, सिवनी- 480661 (म.प्र.)
मोबाईल न.- 7049595861
ईमेल: akhileshvwo@gmail.com