Sunday, 13 September 2015

स्कूल खुले नहीं कि बढ़ चली गाईडों की मांग

स्कूल खुले नहीं कि बढ़ चली गाईडों की मांग
क्या यह शिक्षा व्यवस्था का बंटाधार नहीं?
स्कूल खुले वर्तमान शिक्षा सत्र के अभी जुमे-जुमे तीसरा महीना ही चल रहा है कि अभी से विभिन्न कक्षाओं मे पढऩे वाले बच्चे अपने अभिभावकों पर 'गाईडÓखरीदवाने की जिद थोपते देखे जा रहे हैं। प्रश्र यह उठता है कि जब विभिन्न विषयों से संबंधित पाठ्य पुस्तकें उपलब्ध है, वर्ग विशेष के छात्रों के लिए नि:शुल्क भी तो फिर ऐसे में बच्चे उन्हें पढऩे और ज्ञानवर्धन के लिये क्योंकर उसके स्थान पर शार्टकर्ट अपनाने में लगे हुए हैं। इसस तो साफ झलकता है कि छात्र ज्ञानवर्धन नहीं बल्कि अगली कक्षा में थोथा प्रवेश ही चाहने लगे हैं। वैसे भी शासन की नीतियों के तहत कक्षा एक से आठ तक अब किसी को अनुत्तीर्ण घोषित नहीं किया जा रहा है। परीक्षाएं महज खानापूर्ति बनकर रह गई हैं। ग्रेड ए, बी, सी  आदि देकर गली कक्षा में भेज दिया जा रहा है। इसका खामियाजा यह कि कक्षा 9 वी में पहुंचने वाले अधिकांश छात्र लगभग उसके लिये अयोग्य ही साबित हो रहे हैं। काम्पीटिशन की उत्कंठा में ऐसे कर्मण्य छात्र जो काफी हद तक फिसड्डी होते हैं वे अपनी हीनभावना से ग्रसित हो बजाय विस्तृत अध्ययन के गाइडों के मकडज़ाल और तो और श्योर-सक्सेस कथित टवेंटी कलेक्शन को ही मात्र साल भर रट्टा लगाकर अपनी शैक्षणिक योग्यता पर प्रश्रचिन्ह लगा रहे हैं।
गाईडों के इस प्रेरक प्रसंग में स्कूल के अध्यापकों का भी कमतर योगदान नहीं है। वे स्वयं ढंग से पढ़ाने की बजाय छात्रों को अमुक-अमूक गाईडें खरीदने उकसा रहे हैं, ऐसे में अभिभावकों की यहां महति जिम्मेदारी बन पाती है कि वे अपने बच्चों को गाईडों के प्रयोग पर अंकुश लगा पाठ्यपुस्तकों की ओर प्रेरित करें। शालाओं खासकर शासकीय में तो प्रिंसीपल सहित अध्यापको को सख्त निर्देश जारी किये जाये कि वे सौहार्दपूर्ण वास्तविक अध्ययन के लिये प्रेरित करें। 

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