नशामुक्ति अभियान को ठेंगा दिखा रहे युवा अध्यक्ष
राष्ट्रचंडिका/ सिवनी। राष्ट्रचंडिका की कलम सच्चाई उगलने के लिए जानी जाती है। राष्ट्रचंडिका पर पहले भी सच्चाई को छुपाने का दबाव आ चुका है लेकिन हमारी कलम बिकाऊ नहीं है। थानों मेें झूठी शिकायत करने, डंपर से कुचलवाने और हमकों ब्लेकमेलर कहने वाले पहले अपने गिरेबां में झांक लें कि वे कितने पाक है।
ब्राम्हण समाज एक पवित्र और सभ्य समाज कहलाता है लेकिन इस समाज में भी कुछेक ऐसे कलंक है जो समाज के सामने अपने आपको स्वच्छ छवि का साबित करने में लगे रहते हैं लेकिन उनका मन कोयले से भी काला है। बताते हैं कि ब्राम्हण समाज के युवा (प्रौढ़ हो चले)अध्यक्ष अजय मिश्रा इन दिनों शराब लॉबी में अपना भाग्य आजमा रहे हैं। जबकि ब्राम्हण समाज का उद्देश्य नशामुक्ति व सुंस्कृत भारत का निर्माण करना है लेकिन जब इसके पदाधिकारी ही ऐसी ओछी हरकत करने लगे तो इसे कलंक ही कहना बेहतर होगा। पं. अजय की महात्वाकांक्षा को जो रातो रात 'धनपशुओंÓ में शामिल होने की कवायद में लगभग हर प्रकार के धंधो में टांग अड़ाए बैठे हैं। अब कुछ चुनिंदा व्यवसाय के क्षेत्र बचे हैं। कभी ये छोटे-मोटे स्कूल, छात्रावास बनाते थे, रोड बनाने लगे फिर भी मन नहीं माना तो पत्रकार बन बैठे लेकिन यहां भी उनकी दाल नहीं गली तो उन्होंने शराब लॉबी में पर्दापण करना ही उचित समझा।
जिला ब्राम्हण समाज के जिलाध्यक्ष पंडित महेश प्रसाद तिवारी व ब्राम्हण समाज की सेवा के लिए तत्पर रहने वाले ओमप्रकाश तिवारी को भी ये नजर नहीं आ रहा है कि उनके समाज का ही युवा अध्यक्ष अजय मिश्रा गलत राह में चल बैठा है। ब्राम्हण समाज में चर्चा यह भी है कि युवा अध्यक्ष के नये धंधे में इन दोनों ही (पदाधिकारी) की राशि लगी है। बहरहाल एक ओर जहां जगदगुरू शंकराचार्य नशामुक्ति अभियान चलाकर शराब से लोगों को दूर कर रहे हैं।
ऐसा लगता है कि जिला ब्राम्हण समाज के जिलाध्यक्ष एवं श्री तिवारी जी जगदगुरू शंकराचार्य के इस नशामुक्ति अभियान को ठेंगा दिखाते नजर आ रहे हैं।
बताते हैं कि इनके चाटुकार राष्ट्रचंडिका के संपादक को कुत्ते की मौत मरने की बात कहते हैं। चाटुकार कहते हैं कि टुचपुंदिया पत्रकार 500 -1000 रूपए के लिए हमारे आका के आगे-पीछे गिड़गिड़ाते रहते हैं। चाटुकार तो यह भी कहते हैं कि मंडला के एक व्यक्ति को संपादक की सुपारी भी देने की भी चर्चा है।
राष्ट्रचंडिका/ सिवनी। राष्ट्रचंडिका की कलम सच्चाई उगलने के लिए जानी जाती है। राष्ट्रचंडिका पर पहले भी सच्चाई को छुपाने का दबाव आ चुका है लेकिन हमारी कलम बिकाऊ नहीं है। थानों मेें झूठी शिकायत करने, डंपर से कुचलवाने और हमकों ब्लेकमेलर कहने वाले पहले अपने गिरेबां में झांक लें कि वे कितने पाक है।
ब्राम्हण समाज एक पवित्र और सभ्य समाज कहलाता है लेकिन इस समाज में भी कुछेक ऐसे कलंक है जो समाज के सामने अपने आपको स्वच्छ छवि का साबित करने में लगे रहते हैं लेकिन उनका मन कोयले से भी काला है। बताते हैं कि ब्राम्हण समाज के युवा (प्रौढ़ हो चले)अध्यक्ष अजय मिश्रा इन दिनों शराब लॉबी में अपना भाग्य आजमा रहे हैं। जबकि ब्राम्हण समाज का उद्देश्य नशामुक्ति व सुंस्कृत भारत का निर्माण करना है लेकिन जब इसके पदाधिकारी ही ऐसी ओछी हरकत करने लगे तो इसे कलंक ही कहना बेहतर होगा। पं. अजय की महात्वाकांक्षा को जो रातो रात 'धनपशुओंÓ में शामिल होने की कवायद में लगभग हर प्रकार के धंधो में टांग अड़ाए बैठे हैं। अब कुछ चुनिंदा व्यवसाय के क्षेत्र बचे हैं। कभी ये छोटे-मोटे स्कूल, छात्रावास बनाते थे, रोड बनाने लगे फिर भी मन नहीं माना तो पत्रकार बन बैठे लेकिन यहां भी उनकी दाल नहीं गली तो उन्होंने शराब लॉबी में पर्दापण करना ही उचित समझा।
जिला ब्राम्हण समाज के जिलाध्यक्ष पंडित महेश प्रसाद तिवारी व ब्राम्हण समाज की सेवा के लिए तत्पर रहने वाले ओमप्रकाश तिवारी को भी ये नजर नहीं आ रहा है कि उनके समाज का ही युवा अध्यक्ष अजय मिश्रा गलत राह में चल बैठा है। ब्राम्हण समाज में चर्चा यह भी है कि युवा अध्यक्ष के नये धंधे में इन दोनों ही (पदाधिकारी) की राशि लगी है। बहरहाल एक ओर जहां जगदगुरू शंकराचार्य नशामुक्ति अभियान चलाकर शराब से लोगों को दूर कर रहे हैं।
ऐसा लगता है कि जिला ब्राम्हण समाज के जिलाध्यक्ष एवं श्री तिवारी जी जगदगुरू शंकराचार्य के इस नशामुक्ति अभियान को ठेंगा दिखाते नजर आ रहे हैं।
बताते हैं कि इनके चाटुकार राष्ट्रचंडिका के संपादक को कुत्ते की मौत मरने की बात कहते हैं। चाटुकार कहते हैं कि टुचपुंदिया पत्रकार 500 -1000 रूपए के लिए हमारे आका के आगे-पीछे गिड़गिड़ाते रहते हैं। चाटुकार तो यह भी कहते हैं कि मंडला के एक व्यक्ति को संपादक की सुपारी भी देने की भी चर्चा है।
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