Sunday, 9 October 2016

क्या गरबा समितियां देगी चंदे का हिसाब

क्या गरबा समितियां देगी चंदे का हिसाब
                 सायकल स्टैण्ड के भी वसूलते हैं पैसे,
                    गरबा की आड़ में पनपती है बुराईयां
राष्ट्रचंडिका/सिवनी। मां दुर्गा की आराधना का पर्व नवरात्रि में भक्ति के लिये लोगों ने गरबा को माध्यम बनाया और कुछ वर्षो तक गरबा पवित्र भावना के साथ खेला जाता रहा है लेकिन आज इस गरबाकी झलक भी नहीं दिखती क्योंकि गरबा की रासलीला का स्वरूप ही परिवर्तित हो गया है जिसका जो समझ में आता है गरबा प्रशिक्षण के नाम पर अपनी दुकान खोल लेते हैं और युवा बालिकाओं व बालकों को गुमराह करते हैं।
इस वर्ष गरबा प्रशिक्षण के नाम पर नगर की कुछ प्रशिक्षण प्राप्त करने वालो ने नगर के संभ्रात लोगों से आयोजन के नाम पर अच्छा खासा चंदा बटोरा और इस चंदे में प्रशिक्षण देने वालों ने एक कमेटी बनाकर राशि वसूल कर राशि का बंदरबांट तक किया।
हम यहां पर बताना चाहते हैं कि चार माह पहले से इन संस्थाओं द्वारा गरबा का प्रशिक्षण प्रारंभ कर दिया जाता है। संभ्रात परिवार की महिलायें गरबा सीखने के लिये घरों से निकलती है और गरबा सीखने के साथ साथ समाज की अनेक बुराईयो को भी अपने साथ लेकर आती है जिसके कारण गरबा की आड़ में विकृतियां फलती फूलती हैं लेकिन इस ओर ना तो कोई बोलने का साहस करता है और ना ही जिला प्रशासन ही इन पर अंकुश लगाता है।
गरबा प्रशिक्षण हो या महोत्सव इनके नाम से वसूला जाने वाला चंदा या उपयोग एवं आय व्यय का ब्यौरा लेने का दुस्साहस कोई नहीं करता है। क्या आयोजन समिति का दायित्व नहीं बनता कि वे गरबा से प्राप्त आय व्यय प्रस्तुत कर अपने कार्यो में पारदर्शिता लाये लेकिन हमे विश्वास है कि जिस दिन आय व्यय का ब्यौरा पेश किया जाने लगेगा उस दिन हमारे द्वारा जो बाते कही जा रही है उन बातों को भी समाज के लोग सही मानने लगेंगे। कहते हैं सच उस कड़वी दवा की तरह होता है जो कड़वी होने के कारण बीमार को भी स्वस्थ्य कर देती है। यही स्थिति गरबा महोत्सव की है। अगर समय रहते इस पर विचार नहीं किया गया तो बाद में पछताना पड़ेगा।
लगभग सात-आठ दिनों से अनेक स्थानों में चल रहे गरबा महोत्सव को पारिवारिक महोत्सव का नाम दिया जाता है लेकिन आयोजक दोपहिया चौपहिया वाहनों में आने वाले परिवार के लोगों से पार्किंग चार्ज, प्रवेश शुल्क तथा रसीद काटने में भी पीछे नहीं रहते।
इनकी यह स्थिति को देखकर ऐसा लगने लगा है कि मानो गरबा के नाम पर इन गरबा प्रशिक्षकों को लूटने की खुली छूट दे दी गयी है। समय की मांग है कि समाज अब गरबा प्रशिक्षकों से आय व्यय का हिसाब मांगे । हमारा गरबा के भक्ति स्परूप में आ रही बुराईयों की ओर ध्यान आकर्षित करने के पीछे यही उद्देश्य है कि मां भवानी की तपस्या का यह पर्व गरिमा और शालीनता के साथ मनाया जाये ना कि लोग इसे अपनी उदर पूर्ति का साधर बनाये। 

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