Sunday, 13 September 2015

खाकी 24 घंटे और सफेद मात्र सुबह- शाम

खाकी 24 घंटे और सफेद मात्र सुबह- शाम

ट्रेफिक क्या पुलिस से अलग है?
राष्ट्रचंडिका/सिवनी। सत्यमेव जयते के मूल पंच लाईन को लेकर समाज की सुरक्षा में तैनात राष्ट्रकवि मैथिलिशरण गुप्त के धनुर्धर अर्थात 'पोलिसÓ जो पुलिस कहलाती है के लिए क्या विभिन्न तैनाती के लिये अलग-अलग मानदण्ड निर्धारित है? यह सोच और शोध का विषय हेै क्योंकि जब समान आचार संहिता की बात जबरदस्त रूप से जारी है समान कार्य समान वेतन? समान रूप से पदोन्नति? समान अवसर कील बात हो रही है तो ऐसे में 'पुलिस महकमेÓ में यह विसंगतियां क्यों देखी जा रही है। प्रशासन की इस विसंगति से दूसरे तो क्या पुलिस महकमे के कर्मचारी भी नाराज है, यह बात अलग है कि वे कथित तौर पर थोपे गए अनुशासन की लगाम से कसे हुए हैं।
बात करें पुलिस संगठन के विभिन्न प्रभारों की जिसमें एसबी, आईबी और 'ट्रेफिकÓ भी आते हैं। इन ब्रांचों में भी वे ही पुलिसकर्मी होते हैं जो सामान्य तौर पर थाना कोतवाली में हुआ करते हैं। 

बत्ती नहीं सम्मान चाहिए: शंकराचार्य

बत्ती नहीं सम्मान चाहिए: शंकराचार्य
भड़के शंकराचार्य, पुलिस ने मुझे फंसाने की रची थी साजिश
जगदगुरू शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती जी महाराज हिन्दु धर्म के सबसे बड़े गुरू कहलाते हैं और इनके साथ त्रयम्बकेश्वर पुलिस ने जो अभद्रता की है वह माफी के लायक भी नहीं है। इस घटना के बाद पूरे देशभर के हिन्दु समुदाय में आक्रोश उपजना शुरू हो गया है। पीठाधीश्वर कहलाने वाले स्वामी शंकराचार्य के वाहन से लालबत्ती उतारना और उनके वाहन को चेकिंग के लिए ले जाने की जिद करना पुलिस की मूर्खता को दर्शाता है।
राष्ट्रचंडिका/ असल में गत दिवस त्रयम्बकेश्वर स्थित अपने चातुर्मास कैम्प में स्वामी शंकराचार्य महाराज ठहरे हुए थे जहां  पुलिस ने अपनी मूर्खता का परिचय देते हुए स्वामी जी के वाहन को अपने साथ थाने ले जाकर चैकिंग करने की जिद पर अड़ गई। इतना ही नहीं नासिक पुलिस ने उनके वाहन से लालबत्ती भी उतरवा दी। स्वामी शंकराचार्य ने प्रेसवार्ता के दौरान इस बात की निंदा करते हुए कहा कि उनके गाड़ी में बम या कोई आपत्तिजनक पदार्थ रखकर पुलिस उन्हें फंसाने के षडय़ंत्र के तहत गाड़ी को थाना ले जाना चाहती थी। द्वारिका एवं ज्योतिष पीठाधीश्वर ने पत्रकारों के सामने अपनी वेदना व्यक्त करते हुए कहा कि यह कितना निंदनीय है कि हिन्दु धर्म के सबसे बड़े गुरू के साथ किसी षडय़ंत्र के तहत आधी रात के दौरान अपमानजनक व्यवहार करने वाले पुलिस विभाग का कोई भी अधिकारी अब तक यह बता पाने में असक्षम है कि आखिरकार उनकी गाड़ी किसके आदेश पर त्रयंबकेश्वर पुलिस जांच के लिये ले जाना चाहती थी।
पालकमंत्री ने लादी बेशर्मी
नासिक के पालकमंत्री गिरीश महाजन ने उस समय बेशर्मी की हदें पार कर दी जब उनके द्वारा कहा गया कि इस छोटे से मामले को इतना तूल न दिया जाये। पालकमंत्री को यह सोचना चाहिए कि यह कोई छोटा मामला नहीं है बल्कि पूरे देश के धर्मगुरू स्वामी शंकराचार्य पर सवालियां निशान लगाना है।  पालकमंत्री गिरीश ने शंकराचार्य महाराज के सहयक सौरभ तिवारी से कहा कि आपकी गाड़ी से जो लालबत्ती उतारी गई है उसे मैं पुलिस के हाथों आप के यहां भेज देता हूं। आप लोग इस छोटी घटना को इतना तूल ना दें। पालकमंत्री के इस प्रस्ताव को शंकराचार्य के सहायकों एवं समर्थकों ने यह कहकर रद्द कर दिया कि मुझे बत्ती नहीं खोया हुआ सम्मान वापिस चाहिए। 500 रू. की बत्ती तो हम बाजार से खरीदकर भी लगवा सकते हैं।
रख सकते थे बम
स्वामी शंकराचार्य जी महाराज ने प्रेसवार्ता के दौरान कहा कि अब तो मुझे यह संभावना दिख रही है कि अगर उस दिन मेरी गाड़ी पुलिस थाने ले जाने में सफल हो जाती तो वह षडय़ंत्र के तहत गाड़ी में बम या कोई भी ऐसी आपत्तिजनक पदार्थ रख देती जिससे मेरे पद के अनुसार सनानत धर्म की गरिमा को ठेस पहुंचती। 

स्कूल खुले नहीं कि बढ़ चली गाईडों की मांग

स्कूल खुले नहीं कि बढ़ चली गाईडों की मांग
क्या यह शिक्षा व्यवस्था का बंटाधार नहीं?
स्कूल खुले वर्तमान शिक्षा सत्र के अभी जुमे-जुमे तीसरा महीना ही चल रहा है कि अभी से विभिन्न कक्षाओं मे पढऩे वाले बच्चे अपने अभिभावकों पर 'गाईडÓखरीदवाने की जिद थोपते देखे जा रहे हैं। प्रश्र यह उठता है कि जब विभिन्न विषयों से संबंधित पाठ्य पुस्तकें उपलब्ध है, वर्ग विशेष के छात्रों के लिए नि:शुल्क भी तो फिर ऐसे में बच्चे उन्हें पढऩे और ज्ञानवर्धन के लिये क्योंकर उसके स्थान पर शार्टकर्ट अपनाने में लगे हुए हैं। इसस तो साफ झलकता है कि छात्र ज्ञानवर्धन नहीं बल्कि अगली कक्षा में थोथा प्रवेश ही चाहने लगे हैं। वैसे भी शासन की नीतियों के तहत कक्षा एक से आठ तक अब किसी को अनुत्तीर्ण घोषित नहीं किया जा रहा है। परीक्षाएं महज खानापूर्ति बनकर रह गई हैं। ग्रेड ए, बी, सी  आदि देकर गली कक्षा में भेज दिया जा रहा है। इसका खामियाजा यह कि कक्षा 9 वी में पहुंचने वाले अधिकांश छात्र लगभग उसके लिये अयोग्य ही साबित हो रहे हैं। काम्पीटिशन की उत्कंठा में ऐसे कर्मण्य छात्र जो काफी हद तक फिसड्डी होते हैं वे अपनी हीनभावना से ग्रसित हो बजाय विस्तृत अध्ययन के गाइडों के मकडज़ाल और तो और श्योर-सक्सेस कथित टवेंटी कलेक्शन को ही मात्र साल भर रट्टा लगाकर अपनी शैक्षणिक योग्यता पर प्रश्रचिन्ह लगा रहे हैं।
गाईडों के इस प्रेरक प्रसंग में स्कूल के अध्यापकों का भी कमतर योगदान नहीं है। वे स्वयं ढंग से पढ़ाने की बजाय छात्रों को अमुक-अमूक गाईडें खरीदने उकसा रहे हैं, ऐसे में अभिभावकों की यहां महति जिम्मेदारी बन पाती है कि वे अपने बच्चों को गाईडों के प्रयोग पर अंकुश लगा पाठ्यपुस्तकों की ओर प्रेरित करें। शालाओं खासकर शासकीय में तो प्रिंसीपल सहित अध्यापको को सख्त निर्देश जारी किये जाये कि वे सौहार्दपूर्ण वास्तविक अध्ययन के लिये प्रेरित करें।