एंटी इनकंबेंसी और आदिवासी होंगे विधानसभाओं के नियामक
सिवनी राष्ट्र चंडिका।(अखिलेश दुबे)मौजूदा
वर्ष के अंत में प्रदेश के विधानसभा चुनाव की रणभेरी बजने जा रही
है।राजनीतिक कशमकश और उठापटक के दौर जारी हो चुके हैं।
गिरगिट(केमेलियान)नामक प्राणी की चर्चा आम बोलचाल की भाषा में आम हो चला
है! अपने “गिरगिटिया या रंग बदलने”की फितरत के चलते। आम तौर पर इस प्रकार
के तत्वों को “सिक्केबाज” या दलबदलू कहा जाता है। मौका और मिजाज को देखते
हुए खेमे बाज चोला बदलने को तत्पर दिखाई दे रहे हैं।स्थापित राजनेता भी
कुर्ता झटक कर तैयार हो रहे हैं। जनता सब देख रही है।उसकी मानसिकता स्पष्ट
नहीं है। पर रुझान कुछ-कुछ अस्पष्ट परंतु समझ में आ रहे हैं।तो जानते हैं
“जन संवाद” पर आधारित “राष्ट्र चंडिका” का व्यापक सर्वे@
परिसीमन से आहत
विखंडित सिवनी जिले की बात करें तो इसमें 4 विधानसभा सीटें हैं जबकि जिले
का 1 विधानसभा क्षेत्र का भाग मंडला संसदीय क्षेत्र में समाहित होने के
चलते जिले के लिए कोतूहल नहीं रह गया है ।सिवनी की चार विधानसभा क्रमशः
सिवनी, बरघाट ,केवलारी व लखनादौन है यहां से मुनमुन राय निर्दलीय (अब
भाजपा) कमल मर्सकोले भाजपा रजनीश सिंह कांग्रेस व योगेंद्र बाबा कांग्रेस
है।
सर्वे रिपोर्ट्स
कहती है कि इन चुनावों में “एंटी इनकंबंसी” सेक्टर काफी हद तक प्रभावी हो
सकता है। अर्थात वर्तमान व्यवस्था से बदलाव की ख्वाईश।कारण यह है कि उक्त
वर्तमान विधायकों द्वारा अपने-अपने क्षेत्रों के लिए कोई विशिष्ट योगदान
नहीं दिया गया है। वे जनता की अपेक्षाओं पर खरे नहीं उतरे हैं।कोई निर्दलीय
के नाते तो कोई विपक्ष दल का होने का रोना रो कर अपनी नाकामी छुपाते
हैं।इनमें एकमात्र भाजपा विधायक तो बंगले झांकने नजर आते हैं।कुल मिलाकर अब
जनता में वर्तमान को बदलने की अकुलाहट देखी जा रही है या संकेत है भविष्य
की “पार्टी टिकट विक्रेताओं” को।
वर्तमान विधायकों की चाहे
वह कोई हो धरातलपर उनकी उपलब्धियां जीरो ही है। जनता की अपेक्षाओं पर वे
इन साढे चार सालों में खोटे ही साबित हुए हैं। ऐसा जनमानस के रुझानों से
समझ आ रहा है।अब बात की जाए तो क्षेत्रीय लहर या प्रभाव की तो एक चीज तो इस
चुनावी परिदृश्य के तहत तेजी से उठ रही है वह है दो दलों की राजनीतिक
ध्रुवीकरण के बीच तीसरी जातीय समीकरण आधारित एक मोर्चे का गठन! वह है
गोंडवाना गणतंत्र पार्टी समर्थित आदिवासी युवाओं का संगठन “जयस”। इस नए
मोर्चे ने ऐलान किया है कि आदिवासी (सुरक्षित सीटों) पर जो वह अपने
प्रत्याशी खड़े करेंगे ही यहाँ वह भाजपा या कांग्रेस के साथ नहीं जाएंगे
साथ ही “जयस” अन्य सामान्य सीटों पर भी खंबे ठोकेंगा। जयस का ऐलान
“गीदड़-धमकी”नहीं है क्योंकि जिले की सभी विधानसभाओं में आदिवासी मतदाताओं
की खासी संख्या है जो चुनावी गणित को प्रभावित करने में सक्षम है।
-आदिवासी समर्थित गोंडवाना की “जयस”-
इकाई आदिवासी सुरक्षित बरघाट और लखनादौन
पर तो सीधे प्रभावित करेगी पर उसके प्रभाव से केवलारी और सिवनी भी
प्रभावित हुए बिना नहीं रह पाएँगे।केवलारी उसका विशेष टारगेट हो सकता है।
अब बात फिर मौका परस्तों की कीजाऐ तो ऐसा पहले भी हो चुका है कि स्थापित
राजनीतिक दल भाजपा और कांग्रेस आदिवासियों को वोट बैंक समझ उन्हें साध ही
लेता है।
बहरहाल इन
परिस्थितियों में गौर किया जाए तो “एंटी इनकंबेंसी” और “आदिवासी साधना”इन
चुनावों में महती भूमिका निभाने तैयार हैं।जो दल इससे निजात पा
कर आदिवासियों को ताने में कस लेंगे वह ही सीटों का वर्णन करेंगे।
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